वोट की राजनीति के चलते राजनीतिक महत्वाकांक्षा एक अलग तरह की सामाजिक बीमारी को जन्म दे देती है। ऐसे में कुछ राजनीतिक नेताओं को छोड़ दें तो अधिकांश पर जनता को कम से कम अपने स्वयं विकास के मामले में उन पर भरोसा नहीं होता। ऐसे में संघ और संघ प्रेरित संगठनों की आवश्यकता और सामयिकता अधिक बढ़ जाती है। भारत स्वतंत्र हुआ और स्वतंत्रता के बाद संघ ने व्यक्ति निर्माण के साथ-साथ भारतीयता और राष्ट्र निष्ठा को अपना प्रमुख लक्ष्य बनाया। संघ की इस पवित्र विचारधारा को, आजादी के बाद सत्ता प्रतिष्ठान में विराजमान राजनीतिकों और राजनीति के एक वर्ग ने स्वीकार नहीं किया, क्योंकि संघ की विचारधारा उनके तुष्टीकरण के एजेंडे से मेल नहीं खाती थी, फिर भी तमाम चुनौतियों के बावजूद संघ अपने मार्ग पर निरंतर बढ़ता रहा।
– संजय गुप्ता, मुख्य संपादक, दैनिक जागरण #Vijayadashami


