आज पूरा विश्व पानी की संकट को लेकर जूझ रहा है। अफ्रीका के कैपटाउन में क्रिकेट मैच का आयोजन सिर्फ इसलिए स्थगित कर दिया गया क्योंकि जल संकट था। पर्यटकों के पसंदीदा जगह शिमला में भी पर्यटकों के आने पर नगर निगम ने हाथ खड़े कर लिये। गर्मी के दिनों में शिमला में जितने पर्यटक आते हैं उतने लोगों के लिए जल उपलब्ध करा पाना संभव नहीं था। इस जल संकट से निपटने के लिए वैश्विक स्तर पर वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम को अनिवार्य किया जा रहा है। भारत के कई राज्यों में भी इसपर गंभीरतापूर्वक विचार किया गया। वहां की राज्य सरकारें भी इस मामले को लेकर काफी सख्त हैं। जयपुर समेत कई शहरों ने वाटर हार्वेस्टिंग के कारण अपने यहां जल संकट की समस्या से काफी हद तक निजात पा लिया है। लेकिन, दुर्भाग्य बिहार के साथ है।
भारत के स्मार्ट सिटी में शुमार भागलपुर समेत कई शहरों में लोग वाटर हार्वेस्टिंग के प्रति संवेदनशील नहीं है। भागलपुर में निगम सिर्फ पांच इमारतों में ही यह सिस्टम लगवा सका। गत डेढ़ साल में भागलपुर नगर निगम ने बड़े जोर-शोर से शहर के सभी माॅल व एपार्टमेंट में वाटर हार्वेस्टिंग लगाने की योजना शुरु की। लेकिन, यह योजना ठंडे बस्ते में चली गयी। शहर के 54 इमारतों को वाटर हार्वेस्टिंग के लिए चिन्हित किया गया था। लेकिन, 49 इमारतों में इसकी कोई सुगबुगाहट नहीं देखी। इसका परिणाम यह हुआ कि इस वर्ष तकरीबन 1.89 करोड़ लीटर पानी नालों में बह गया। इस विषय के विशेषज्ञ लोगों का मानना है कि 5 हजार वर्ग मीटर में बने मकान की छत से 5 लाख लीटर पानी एक साल में जमीन के अंदर पहुंचाया जा सकता है।
एक तरफ तो भागलपुर में मानसून का पानी नालों में बह रहा है। वहीं शहर की जरूरतों को पूरा करने के लिए बरारी वाटर वर्क्स से प्रतिदिन 1.10 करोड़ लीटर पानी मंगायी जाती है। शहर के भीखनपुर, रेलवे स्टेशन रोड, तिलका मांझी, खलीफाबाग चौक, पटल बाबू रोड, गौशाला रोड, मिरजान हाट, आदमपुर सरीखे मुहल्लों में वाटर हार्वेस्टिंग की अभाव में लोगों को पानी के लिए अब नित्य बोरिंग का लेवल बढ़ाना पड़ रहा है।

— संजीव कुमार

Leave a Reply

Your email address will not be published.