31 जुलाई : बलिदान-दिवस
ऊधमसिंह का जन्म ग्राम सुनाम, जिला संगरूर, पंजाब में 26 दिसंबर, 1899 को सरदार टहलसिंह के घर में हुआ था। मात्र दो वर्ष की अवस्था में ही इनकी मां का और सात साल का होने पर पिता का देहान्त हो गया। ऐसी अवस्था में किसी परिवारजन ने इनकी सुध नहीं ली। गली-गली भटकने के बाद अंततः इन्होंने अपने छोटे भाई के साथ अमृतसर के पुतलीघर में शरण ली। यहां एक समाजसेवी ने इनकी सहायता की।
19 वर्ष की तरूण अवस्था में ऊधम सिंह ने 13 अप्रैल, 1919 को बैसाखी के पर्व पर जलियांवाला बाग, अमृतसर में हुए नरसंहार को अपनी आंखों से देखा। सबके जाने के बाद रात में वे वहां गये और रक्तरंजित मिट्टी माथे से लगाकर इस काण्ड के खलनायकों से बदला लेने की प्रतिज्ञा की। कुछ दिन उन्होंने अमृतसर में एक दुकान भी चलायी। उसके फलक पर उन्होंने अपना नाम ‘राम मोहम्मद सिंह आजाद’ लिखवाया था। इससे स्पष्ट है कि वे स्वतंत्रता के लिए सभी धर्मों का सहयोग चाहते थे।
ऊधमसिंह को सदा अपना संकल्प याद रहता था। उसे पूरा करने हेतु वे अफ्रीका से अमरीका होते हुए 1923 में इंग्लैंड पहुंच गये। वहां क्रांतिकारियों से उनका संपर्क हुआ। 1928 में वे भगत सिंह के कहने पर वापस भारत आ गये; पर लाहौर में उन्हें शस्त्र अधिनियम के उल्लंघन के आरोप में पकड़कर चार साल की सजा दी गयी। इसके बाद वे फिर इंग्लैण्ड चले गये।


13 मार्च, 1940 को वह शुभ दिन आया, जिस दिन ऊधम सिंह को अपना संकल्प पूरा करने का अवसर मिला। इंग्लैंड की राजधानी लंदन के कैक्स्टन हाॅल में एक सभा होने वाली थी। इसमें जलियांवाला बाग काण्ड के दो खलनायक सर माइकेल ओ डायर तथा भारत के तत्कालीन सेक्रेटरी आॅफ स्टेट लार्ड जेटलैंड आने वाले थे। ऊधमसिंह चुपचाप मंच से कुछ दूरी पर जाकर बैठ गये और उचित समय की प्रतीक्षा करने लगे।
सर माइकेल ओ डायर ने अपने भाषण में भारत के विरुद्ध बहुत विषवमन किया। जैसे ही उसने अपना भाषण पूरा किया, ऊधम सिंह ने खड़े होकर उसके सीने पर गोली दाग दी। डायर वहीं ढेर हो गया। अब लार्ड जैटलैण्ड की बारी थी; पर उसकी किस्मत अच्छी थी। वह घायल होकर ही रह गया। सभा में भगदड़ मच गयी। ऊधम सिंह चाहते, तो भाग सकते थे; पर वे सीना तानकर वहीं खड़े रहे और स्वयं को गिरफ्तार करा दिया।
न्यायालय में वीर ऊधम सिंह ने आरोपों को स्वीकार करते हुए स्पष्ट कहा कि मैं पिछले 21 साल से प्रतिशोध की आग में जल रहा था। डायर और जैटलैण्ड मेरे देश की आत्मा को कुचलना चाहते थे। इसका विरोध करना मेरा कत्र्तव्य था। इससे बढ़कर मेरा सौभाग्य क्या होगा कि मैं अपनी मातृभूमि के लिए मर रहा हूं। न्यायालय के आदेश पर ऊधम सिंह को 31 जुलाई 1940 को पेण्टनविला जेल में फांसी दे दी गयी। मरते समय उनके चेहरे पर मधुर मुस्कान तैर रही थी। उन्होंने कहा- दस साल पहले मेरा प्यारा दोस्त भगत सिंह मुझे अकेला छोड़कर फांसी पर चढ़ गया था। अब मैं उससे वहां जाकर मिलूंगा। वह मेरी प्रतीक्षा कर रहा होगा।
स्वतंत्रता प्राप्ति के 27 साल बाद 19 जुलाई, 1974 को उनके भस्मावशेषों को भारत लाया गया। पांच दिन उन्हें जनता के दर्शनार्थ रखकर ससम्मान हरिद्वार में प्रवाहित कर दिया गया।

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