विसके- भारत में संन्यास की एक विशेष परंपरा है। हिंदू धर्म में ब्रह्मचर्य गृहस्थ वानप्रस्थ और फिर सन्यास को आश्रम व्यवस्था कहा गया है; पर कई लोग पूर्व जन्म के संस्कार या वर्तमान जन्म के आध्यात्म और समाज सेवा के प्रति प्रेम होने के कारण ब्रह्मचर्य से सीधे सन्यास आश्रम में प्रविष्ट हो जाते हैं।

आध शंकराचार्य ने समाज में हो रहे विघटन एवं देश-धर्म पर हो रहे आक्रमण से रक्षा हेतु दशनामी सन्यासियों की परंपरा प्रारंभ की; पर दशनाम  संन्यासियों से अलग भी अनेक प्रकार के पंथ और संप्रदाय है, जिनमें रह कर कई लोग सन्यास व्रत धारण करते हैं ऐसे लोग प्रायः भगवा वस्त्र पहनते हैं जो त्याग और बलिदान के प्रतीक है।

ऐसे ही एक सन्यासी थे स्वामी प्रेमानंद जिन्होंने सन्यास लेने के बाद समाज सेवा को ही अपने जीवन का ध्येय बनाया। वह पूजा पाठ एवं साधना तो करते थे पर उन की मुख्य पहचान परोपकार के कामों से हुई।

स्वामी जी का जन्म 18 नवंबर 1930 को पंजाब के एक धनी एवं प्रतिष्ठित परिवार में हुआ संपन्नता के कारण सुख-वैभव चारों ओर बिखरा था; पर प्रेमानंद जी का मन इन भौतिक सुविधाओं की बजाय ध्यान, धारणा और निर्धन-निर्बल की सेवा में अधिक लगता था। इसी से इनके भावी जीवन की कल्पना अनेक लोग करते थे।

प्रेमानंद जी का बचपन कश्मीर की सुरम्य घाटियों में बीता। वहाँ रहकर उनका मन ईश्वर के प्रति अनुराग से भर गया। वह अपने जीवन लक्ष्य के बारे में विचार करने लगे; पर उन्होंने शिक्षा की अपेक्षा नहीं कि उन्होंने आगरा विश्वविद्यालय से इतिहास में और पंजाब विश्वविद्यालय से उर्दू में एम.ए  किया। इसके बाद में अनेक विश्वविद्यालय में प्राध्यापक भी रहे; पर उनके लिए तो परमपिता परमात्मा ने कोई और काम निर्धारित कर रखा था।

धीरे-धीरे उनका मन सांसारिक माया मोह से हट गया। वह समझ गए की भौतिक वस्तुओं में सच्चा सुख नहीं है। वह तो ईश्वर की प्राप्ति और मानव की सेवा में है। उन्होंने विश्वविद्यालय की नौकरी छोड़ दी और अपने आध्यात्मिक गुरु से संन्यास की दीक्षा ले ली। लोग उनके इस निर्णय पर आश्चर्य करते थे; पर अब उनके जीवन का मार्ग दूसरा ही हो गया था।

स्वामी जी ने मानव कल्याण के लिए अनेक ग्रंथों की रचना की उन्होंने हिंदी में मानव जात जीव, श्रृंगार; अंग्रेजी में आर्ट ऑफ लिविंग, लाइफ ए टेंडर स्माइल; उर्दू में ऐ इन्सान जाग नामक पुस्तके लिखीं। ये पुस्तकें आज भी अत्यंत प्रासंगिक है; क्योंकि इनसे पाठकों को अपना जीवन संतुलित करने का पाथेय मिलता है। इन पुस्तकों में अनेक प्रवचन भी संकलित है; जो सरल भाषा में होने के कारण आसानी से समझ में आते हैं।

उनके लेखन और  प्रवचन का मुख्य विषय विज्ञान और धर्म, विश्व शांति, विश्व प्रेम, नैतिक और मानवीय मूल्य, वेदांत और जीवन की कला आदि रहते थे। उन्होंने साधना के बल पर स्वयं पर इतना नियंत्रण कर लिया था कि वह कुल मिलाकर ढाई घंटे ही सोते थे। शेष समय वे सामाजिक कामों में लीन रहते थे। 23 अप्रैल, 1996 को मुकेरियां (पंजाब) के पास हुई एक दुर्घटना में स्वामी जी का देहांत हो गया। आज भी उनके नाम पर पंजाब में अनेक विश्वविद्यालय और धर्मार्थ चिकित्सालय चल रहे है।

By nwoow

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