स्वयं सफलता की कहानी लिखने आसान है परंतु सैकड़ों को सफल बनाना मुश्किल है। और वह भी तब जब आप स्वयं सामान्य परिवार से आते हों। इसमें प्रारंभिक शिक्षा की अहम भूमिका होती है। सरस्वती विद्या मंदिर के संस्कारों में शिक्षित एक प्रतिभावान विद्यार्थी ने समय के शिलालेख पर एक अमिट कथा लिखी है। सफलता की यह कहानी है गया के आशुतोष वर्णवाल की, जो सरस्वती विद्या मंदिर सिंदरी के छात्र रह चुके हैं।

विदेश में काफी अच्छे पैकेज की नौैकरी छाेड़कर इस चाय वाले के बेटे ने अपना स्टार्टअप खड़ा किया और हजाराें गरीब छात्राें की जिंदगी बदलने में मदद की। उनके स्टार्टअप के माध्यम से अब तक 85 हजार छात्रों को 95 करोड़ की स्कॉलरशिप मिली है। बिहार समेत 20 राज्यों के छात्रों को लाभ मिल रहा है। इंजीनियरिंग, मेडिकल, प्रबंधन, एग्रीकल्चर सहित अन्य पाठ्यक्रमों के लिए स्काॅलरशिप उपलब्ध कराई जाती है। उन्हाेंने 2011 में buddy4study स्टार्टअप की शुरुआत की। उनके इस अभियान में 200 देशी-विदेशी मीडिया पार्टनर भी हैं। बिहार, यूपी, झारखंड, उत्तराखंड, महाराष्ट्र, एमपी, राजस्थान, तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, गुजरात, हरियाणा, असम, दिल्ली, मणिपुर, त्रिपुरा, हिमाचल प्रदेश के छात्राें काे स्काॅलरशिप मिली है।

पैसे के अभाव में उनके दो भाई नहीं पढ़ सके तभी उन्होंने संकल्प कर लिया था कि जरूरतमंदों के लिए कुछ करेंगे।

आशुतोष वर्णवाल के घर में इतने पैसे नहीं थे कि चारों भाइयों की पढ़ाई सीबीएसई स्कूल में हो पाती। सिर्फ उनका नामांकन ही सरस्वती विद्या मंदिर, सिंदरी में कराया गया। 2002 में आईआईटी जेईई की परीक्षा उत्तीर्ण कर मरीन इंजीनियरिंग की। 2010 में जब वे एमबीए कर रहे थे, तब पहली बार, शिक्षा के लिए छात्रवृत्ति मिलने की जानकारी मिली। उनके मन में विचार आया कि अगर पहले इसकी जानकारी होती ताे उनके बड़े भाइयों को भी आर्थिक मदद मिलती और वे पढ़ पातें। उस समय से यह विचार उनके मन में बैठ गया। वे एक ऐसे सिस्टम बनाने में लग गए , जिससे किसी भी मेधावी छात्र की पढ़ाई पैसे के अभाव में न रुके।

उनके पिता ताराचंद प्रसाद वर्णवाल गया के फतेहपुर मुहल्ले में रहते थे। पांचवी पास ताराचंद रोजगार के लिए वे 1970 में धनबाद चले गए। वहां पहले चाय व बाद में किराने की दुकान खोली। मां शकुंतला देवी छठी तक पढ़ी थी। बड़े दो बड़े भाई पैसे के अभाव में ज्यादा पढ़ नहीं पाए। जब घर के हालात कुछ अच्छे हुए तो उन्हें सीबीएसई स्कूल में पढ़ने का मौका मिला। सरस्वती विद्या मंदिर में शिक्षा के साथ अच्छे संस्कार भी मिलते हैं।1999 में 10वीं और 2001 में 12वीं की परीक्षा सर्वोच्च स्थकन प्राप्त किया।। 2006 में ब्रिटिश पेट्रोलियम कंपनी में मरीन इंजीनियर बने।

उन्हें लगा की उनके जीवन का सिर्फ यही मकसद नहीं है। विद्या मंदिर के संस्कार और उनके संघर्षों ने उन्हें समाजोपयोगी कार्य करने के लिए प्रेरित किया। जो अभाव के कारण अपने सपने सच नहीं कर पा रहे हैं, उनके लिए मार्ग निककल।2010 में नौकरी छोड़ कैट कर एमबीए के लिए आईएमटी गाजियाबाद में दाखिला लिया। यहीं 2011 में अपने काम की शुरुआत की। बाद में स्टार्टअप से को-फाउंडर के रूप में राज किशोर जुड़े। 10 साल में एक अच्छी कंपनी बनाकर देश की सेवा की, अब अगले 5 साल में 100 अच्छे स्टार्टअप बनाकर समाज की सेवा करने की इनकी इच्छा है।

—- संजीव कुमार

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