उर्दू भाषा में गीता का प्रकाशन पहली बार वर्ष 2002 में हुआ था

यूपी के गोरखपुर स्थित गीता प्रेस ने एक नई पहल शुरू की है। इसमें वे दुनिया को सर्वलोकप्रिय ग्रंथ गीता का नया प्रकाशन करेगी। इसमें गीता की लिपि तो देवनागरी होगी लेकिन उसकी भाषा उर्दू होगी।
लाभ होगा। आज से 15 साल पहले गीता प्रेस ने दुनिया के सर्वलोकप्रिय ग्रंथ गीता का प्रकाशन उर्दू भाषा में गीता को 15 वर्ष पहले प्रकाशित किया था। उस समय मुस्लिम समाज के लोगों ने इसमें काफी रुचि दिखाई और इसे हाथों हाथ लिया।
गीता प्रेस के उत्पाद प्रबंधकलालमणि तिवारी ने बताया कि वर्ष 2002 में गीता उर्दू भाषा में प्रकाशित की गई थी‚ उसकी लिपि फारसी थी और उसका अनुवाद उर्दू था। उसे वही लोग पढ़ सकते हैं जो उर्दू भाषा जानते हैं। लेकिन इस बार इसकी लिपि देवनागरी होगी और भाषा उर्दू होगी।
इसका मुख्य उद्देश्य यह है कि उन लोगों तक भी गीता का संदेश पहुंच सके जो लोग उर्दू लिखना तो नहीं जानते लेकिन उर्दू जबान बोलते और समझते हैं।
उन्होंने कहा क इस रूप में पूरी गीता कंपोज हो चुकी है‚ प्रूफ रीडिंग का कार्य समाप्त हो चुका है। गीता की संपादन की प्रक्रिया अंतिम दौर में चल रही है। अगले माह यह बाजार में आ जाएगी। गोरखपुर में 1923 से गीता प्रेस कुल 15 भाषाओं में धार्मिक पुस्तकें प्रकाशित करता है। अभी तक गीता का प्रकाशन 14 भाषाओं में हो चुका है। 15वीं भाषा नेपाली में है और अभी काठमांडू में अनुवाद का कार्य चल रहा है। उर्दू में गीता का प्रकाशन पहली बार 2002 में हुआ था। उस समय उर्दू में गीता की कुल छह हजार प्रतियां प्रकाशित हुई थीं। इसके बाद 2010 में दो हजार व 2016 में दो हजार प्रतियां प्रकाशित की गईं। साथ ही‚ हिंदी‚ संस्कृत‚ अंग्रेजी‚ बांग्ला‚ मराठी‚ गुजराती‚ तमिल‚ तेलुगू‚ कन्नड़‚ मलयालम‚ उडिया‚ असमिया‚ उर्दू व पंजाबी में भी गीता प्रकाशित हो चुकी है।
गीता प्रेस की यह पहल प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए है। इस ज्ञान धरोहर को आगे बढ़ाने में गीता प्रेस गोरखपुर का योगदान सराहनीय है।
साभार (दैनिक जागरण। 11-01- 2018)

By nwoow

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