सीवान: 18 फरवरी। देश के विकास के लिए सामाजिक एकता की आवश्यकता होती है और समाज में एकता की पूर्व शर्त है सामाजिक समरसता. जब समरसता आएगी तो सामाजिक एकता अपने आप आएगी. इसके लिए हमें प्रयत्न करना होगा उक्त बाते राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पूर्व उत्तर क्षेत्र के क्षेत्र प्रचारक रामदत्त चक्रधर ने “सामाजिक समरसता”  बैठक को संबोधित करते हुए कहा.
अपने भाषण के प्रारंभ में क्षेत्रीय प्रचारक ने कहा कि सामाजिक समरसता के लिए समाज में जागरूकता लाने के लिए ऐसे कार्यक्रमों का आयोजन किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि हमारे समाज में विविधता है. स्वभाव, क्षमता और वैचारिक स्तर पर विविधता का होना स्वाभाविक भी है. भाषा, खान-पान, देवी-देवता, पंथ-सम्प्रदाय तथा जाति व्यवस्था में भी विविधता है. पर यह विविधता कभी हमारी आत्मीयता में बाधा उत्पन्न नहीं करती. विविध प्रकार के लोगों का समूह होने के बावजूद हम सब एक हैं. उन्होंने कहा कि समान व्यवहार, समता का व्यवहार होने से यह विविधता भी समाज का अलंकार बन जाती है.
क्षेत्र प्रचारक जी ने कहा कि हमारे देश में सभी विविधताओं में सबसे अधिक चर्चा जातिगत व्यवस्था की होती है. जातिभेद के कारण ही सामाजिक समस्याएं पैदा होती हैं और ये समस्याएं विषमता को जन्म देती हैं, जिसके कारण संघर्ष होता है. इसलिए समाज से जातिभेद को दूर करना होगा. सवाल किया कि इसका उपाय क्या है ? उन्होंने जोर देकर कहा कि इसका एकमात्र उपाय है सामाजिक समरसता. उन्होंने कहा कि सामाजिक समरसता के लिए जातिगत व्यवस्थाओं को सही दिशा में काम करना चाहिए. जब तक सामाजिक भेदभाव है, तब तक देश में आरक्षण जारी रहना चाहिए और संघ इसे खत्म किए जाने के पक्ष में नहीं है. उन्होंने कहा कि सामाजिक भेदभाव जब तक है तब तक सामाजिक आरक्षण चलेगा, ये संघ का कहना है. और सामाजिक भेदभाव समाप्त हुआ, अब आरक्षण निकालो, ये उनको कहना पड़ेगा जो सामाजिक भेदभाव के शिकार हैं.
क्षेत्र प्रचारक जी ने सामाजिक समरसता के लिए भारतीय जीवन मूल्यों को आचरणीय बनाने पर जोर दिया. उन्होंने कहा कि समरसता की शुरुआत स्वयं से करनी होगी. अपने परिवार में ऐसा वातावरण बनाएं, जिससे सामजिक समरसता को बल मिले. हमारे देश के सभी पंथ-संप्रदायों ने, तथा समाज सुधारकों और संतों ने मनुष्यों के बीच भेदभाव का समर्थन नहीं किया है. समानता प्रत्येक पंथ की उत्पत्ति का मूल तत्व रही है,  लेकिन बाद में समाज को जातियों या संप्रदायों में विभाजित कर दिया गया. भेदभाव लोगों के व्यवहार से भी पैदा होने लगा. उन्होंने भेदभाव खत्म करने की आवश्यकता पर जोर दिया और उन परंपराओं को खारिज किया जो अनावश्यक हैं. उन्होंने कहा कि परम्परा के नाम पर इस भेदभाव को आगे और जारी रहने की अनुमति नहीं दी जा सकती. उन लोगों की भावनाओं को समझा जाना चाहिए जो हजारों वर्षों से पीड़ित रहे हैं. समाज के कई तबकों ने भेदभाव और अन्याय को लंबे समय तक सहा है.
इस मौके पर संघ के सह प्रांत प्रचारक जितेंद्र जी, प्रांत सम्पर्क प्रमुख प्रोफेसर रविन्द्र पाठक, महेन्द्र मठ के महंत तारकेश्वर गिरी, सीवान जिला संघचालक डॉक्टर विनय कुमार सिंह, विभाग प्रचारक राजाराम जी, शम्भू ब्याहूत, सत्येंद्र सिंह सहित कई गणमान्य लोग उपस्थित थे.

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