पटना, 7 मई। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नागपूर में चल रहे त्रितीय वर्ष प्रशिक्षण वर्ग के समापन समारोह हेतु भूतपूर्व महामहिम राष्ट्रपती श्री.प्रणव मुकर्जी व्दारा संघ के प्रमुख अतिथी के रुपमें आनेके संघ के निमंत्रण को स्विक्रिती दी। आपके इस निर्णय से राज़नितिक क्षेत्र में एक घमासान छ़िडा है। श्री. मुकर्जी एक अनुभवी एवम् परिपक्व नेता है।आपकी परिपक्वता एवम् अनुभव ध्यान मे रखतें हुए ही उन्हे अपने विचार स्वयंसेवकों के समक्ष रखने हेतु आमंत्रित किया। वें अपने विचार रखेंगे तथा संघ के विचार भी सुनेंगे। इस अवसर पर वे त्रितिय वर्ष के प्रशिक्षणार्थीयों से भी भेंट करेंगे। ज़िससे संघकार्यं वे करीबसें देखेंगे। विचारोंका आदान-प्रदान यह भारत की प्राचीन परंपरा रही है।

अत: इसे इतना विरोध होनेका कारण क्या हो सकता है ? विरोध करनेवाले लोगोंकी उत्पत्ती तथा मूल देखें तो इस विरोध का आश्चर्य नही लगता। दुर्भाग्य से भारत का वैचारिक वर्गं,पूर्णत: अभारतीय तथा वामपंथी विचार ही अपनी मूल उत्पत्ती माननेंवालोसें प्रभावित है। आत्यंतिक असहिष्णुता एवम् हिंसा का रास्ता अपनानेवालें यह लोग है। सारा विश्व उनकी इस नितींसे भलीभातीं परिंचीत है। अपनोसें भिन्न विचार यें सुनने तक तैय्यार नहीं रहतें तथा हर प्रकार की ताकत सें उसका विरोध करते है। आप वामपंथी नही तो मात्र दक्षिणपंथी ऐसा उनका निर्णय रहता है और आपका विरोध करना, आपकी आवाज़ दबाना,निंदा करना इसीं लायक वें आपकों समझते है। आप वामपंथी नही तो वें आपका हर प्रकारसें विरोध करेंगे। यही उनकी परंपरा रही है।बावजूद वें उदारता, अभिव्यक्ती स्वातंत्र्य की दुहाई देते थकते नही। झूट प्रचार तथा पाखंड़ीपन इनकें खूनमें ही मिला है ।

कुछ़ वर्ष पूर्व ऐसेंहि एक त्रितिय वर्ष वर्ग के समापन समारोह में प्रसिद्ध समाज़सेवी एवम् सर्वोदयी विचारवंत डॉ. रमेश बंग आमंत्रित थे। महाराष्ट्र के वामपंथी तथा समाज़वादी लोगोनें इसका विरोध किया। पूना सें प्रकाशित ‘साधना’ साप्ताहिक जो की समाजवादी विचार सें प्रभावित है, में डॉ. बंग की स्विक्रिती कें विरोध बहुत कुछ़ लिखा। बावजूद डॉ. बंग कार्यक्रम में उपस्थित रहे। उन्होने अपनें भाषण की लिखित प्रत साधना साप्ताहिक को ज़िसमें की उनके खिलाफ काफ़ी कुछ़ लिखा था,दी। परंतु ‘साधना’  के संपादक ने उसे प्रकाशित नही किया।

वामपंथी तथा उनकी छ़त्रछ़ाया में पलनेवाले तथाकथित बुद्धिज़ीवी  विचिरोंकें आदान-प्रदान पर विश्वास ही नहीं रखतें। अपनें विचार सें कोइ असहमत हों यह उन्हे सहन करना असंभव है।सन् २०१० में केरल प्रांत के प्रवास के दरम्यान कोल्लम स्थान पर श्री.केशवन् नायर नामक वामपंथी कामगार नेतासे मेरी मुलाकात हुइ। उन्होने स्थानिक समाचार पत्र में दो लेख लिखे थे। विषय था, ‘वेदोमें दर्शांया विज्ञान’। इस लेख कें कारण वामपंथी पार्टी ने उन्हे बाहर का रास्ता दिखाया। पश्चात उन्होने स्थानिय समाचार पत्रमें वामपंथी विचारधारा पर अनेक लेख भी लिखें। उनकी एक किताब भी प्रकाशित हुइ, जिसका शिर्षक है ‘बियांड़ रेड़’ । जिसकी प्रत उन्होने मुझें भेंट कीं। इस किताब की आवरण प्रुष्ठ पर एक वाक्य लिखा है जों की वामपंथ का वास्तविक परीचय देता है। वे कहते है “कम्युनिझम् आपको केवल एक स्वातंत्र्य देता है वह उसकी तारीफ करनेका स्वातंत्र्य”। ऐसी विचारधारा रखनेवाले तथाकथित बुद्धीजीवी लोगोसें आप विचार कें आदान-प्रदान की उम्मीद कैसे कर सकते हो?

पश्चिम बंगाल में जब वामपंथी सरकार थी तब संघ का प्रचार प्रमुख कें नातें कोलकाता जाना हुआ। स्थानिक पांच व्रुत्तपत्र प्रतिनिधीयोंके साथ परीचय हेतु अनौपचारिक बैठक तय हुइ। स्टेट्समन,इंड़ियन एक्सप्रेस, टाइम्स आँफ इंड़िया साथमें कम्युनिस्ट विचारधारा के समाचार पत्रप्रतिनीधी सें भी मिलनेका प्रयत्न हुआ। परंतु कम्युनिस्ट छ़ोड बाकी सब संपादकोंनें मिलनेका समय दिया। उनसे चर्चां भी अच्छी हुइ। हमारा यह भी आग्रह भी नही था की वे संघ विचार से सहमत हो, परंतु उन्होने संघ विचार जानने हेतु समय तो दिया। केवल कम्युनिस्ट विचारधारा के समाचार संपादक ने “मुझे समय व्यर्थ गवाना नही ” , ऐसे कहते हुए मिलनेसे मना किया। यह है इनकी सहिष्णुता, उदारता तथा लोकतांत्रिक व्यवहार। मैने संघ स्वयंसेवकोसें कहा की यह अलोकतांत्रिक विचार है। अत: मै जब जब कोलकाता आऊ प्रस्तुत समाचार संपादक से भेट हेतु आग्रह अवश्य करें।

‘जयपूर लिटरेचर फेस्टिव्हल’ में श्री. दत्तात्रेयज़ी होसबळे तथा मुझें संघ विचार रखने हेतु निमंत्रित किया गया था। हमनें स्विक्रिती भी दी। वहा भीं जिनका कार्य, विस्तार एवम् प्रभाव समाज जीवन में निरंतर बढ़ रहा है उस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कों  अपने विचार रखनें पर भी कम्युनिस्ट मूल के तथाकथित बुद्धजिवी लोगोनें कड़ी आपत्ती की। सीताराम येचुरी व एम.ए.बेबी जैसे लोगोने उसका बहिष्कार किया। कारण क्या ? तो वहा संघ को अपने विचार रखने का मौका दिया गया। जिस संघ विचार को सभी राज्य के लोग स्विकार कर रहे है, समर्थन दे रहें है,संघ कार्यं मे सहयोग दे रहे है, उस विचार को समझाने हेतु प्रस्तुती के लिए भी इनका विरोध है। यह है इनकी उदारता एवम् अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य। इसके पिछ़े इनकी मानसिकता क्या है ? इन्हे भय है की यदि जनमानस संघ का वास्तव जानता है तो इनके व्दारा संघ के खिलाफ फैलाया झूटा प्रचार, अज्ञान लोगोकें सामने आयेगा। लोगोके  मनका अंधकार दूर होगा।उन्हे संघ का वास्तव समझेगा । वामपंथीयोका यह मूल विचार तथा उनकी यह फ़ासिस्ट विचारधारा  पूर्णत: अभारतीय है।

इसके विपरीत एक अनुभव है । कुछ़ वर्ष पूर्व ‘कम्युनिस्ट पार्टी आँफ चायना’ का प्रतिनिधी मंड़ल भारत आया था। उन्होनें संघ प्रतिनिधी सें मिलनेकीं इच्छा दर्शायी।मै  दिल्ली स्थित संघ के झंड़ेवाला कार्यालय में था। वही उनकी मुलाकात हुइ। उन्होने चीन की प्रसिद्ध ‘चायना वाल’ का स्मृतीचिन्ह भेट किया।मेरें मन में प्रश्न आया की यह लोग राजनितीक दलके,यहाकें राजनितीक दलोंसें इनकी बातचीत समझ सकतें है। परंतु संघ प्रतिनिधी से मिलनेका कारण ?  मेरे सवाल के जवाब मे उन्होने कहा की उनकी पार्टी एक ‘कार्यकर्ता आधारित’ (केडर बेसड्) पार्टी है और आपका संघटन भी कार्यकर्ता आधारित है। इसलीए हम विचारोंका  आदान-प्रदान करना चाहते है। जवाब मे मैनें कहा की “यह सच है, परंतु हम दोनोमें एक मूलभूत फरक है। आप राज़्यसत्ता के लिए राज़्यसत्ता के माध्यम सें कार्य करतें हों ज़बकी हम ना तो राज्यसत्ता कें लिए ना किसी राज़्यसत्ता की माध्यम सें कार्य करतें है। हमारा कार्य सिधा समाज़ के साथ समाज़ के लिए रहता है। “फिर भी हमारी मुलाकात खुलें दिलसें रही।हमने मिलनेसें नकारा नहीं।यह भारतीय परंपरा है।

भारतकें तथाकथित वैचारिक विश्व में वामपंथी विचार का वर्चस्व होनेके कारण तथा काँग्रेस सहित व्यक्ती/परीवार आधारित, प्रादेशिक तथा ज़ाती पर आधारित राजनितीक पक्षोंकें पास उनके अपने राजनितीक विचारवंतोका अभाव होनें के कारण या उनके विचारवंत भी कम्युनिस्ट मूल के लोग होने की वजह से ये पार्टीयाँ उदारतावाद, मानवता, प्रज़ातंत्र, सेक्युलँरिझम् जैसे शब्दोका इस्तेमाल कर,वामपंथी वैचारिक असहिष्णुताका ही परीचय देते है। प्रणवदा का संघ के कार्यक्रम में आनेकों इनका विरोध इनकी वैचारिक असहिष्णुता की पोल खोलती है ।

संघ के चतुर्थं सरसंघचालक श्री.रज्जूभैय्या के उत्तर प्रदेश के एक वरिष्ठ काँग्रेसी नेतासें घनिष्ठ संबंध थे। एकबार श्री.गुरुज़ी के प्रयाग प्रवास के समय वरिष्ठ नागरिकोंके साथ चायपान कार्यक्रम रखा गया। उस कार्यक्रम में वें काँग्रेस के नेता भी निमंत्रीत थे। उन्होंने मा.रज्जूभैय्या से आपनी व्यथा कथन की। उन्होनें कहा की इच्छा होते हुए भी वे नही आ पाएंगे। कारण उनके आनेसे पार्टीमें वह चर्चा होगी जो वें नही चाहते। तब रज्जूभैय्याजी नें उनसें कहा की संघ में इससें विपरीत है। यदि कोइ संघ स्वयंसेवक मुझे आपके साथ देखे तो उसें कोइ शंका नही होगी,उलटा वह यह समझेगा की रज्जूभैय्या आपको संघविचार ही समझा रहे है।

काँग्रेस के लोगोंकों प्रणवदा जैसे स्वच्छ, चारित्र्यवान व्यक्ती के प्रती विश्वास क्यो नही है ? स्वयं जिनके चारीत्र्य पर धब्बे लगे हो और जो प्रणवदा की तुलनामें अनुभवहिन हो वे एक भूतपूर्व राष्ट्रपती जैसे परीपक्व,अनुभवी नेताकों कैसे सलाह दें रहें है ? संघ के किसी भी स्वयंसेवक ने यह नहीं प्रश्न किया की काँग्रेस इतने वरिष्ठ नेताको हमने क्यों आमंत्रीत किया ? संघ की वैचारिक उदारता तथा संघ के आलोचना करनेवालोंकें मनका संकुचित विचार, असहिष्णुता और अलोकतांत्रिकता इसमें यही फरक है। विभीन्न विचारधारा के लोगोनें एकत्र बैठकर विचार विमर्ष करना,यह भारतीय परंपरा है। वैचारिक अस्प्रुश्यता एवम् विचारोंकें आदान-प्रदान का विरोध यह व्रुत्ती निश्चित ही अभारतीय है।

प्रणवदा व्दारा संघ कें निमंत्रण दी गयी स्विक्रिती से भारत के राजकीय तथा वैचारिक क्षेत्र में जों वादविवाद शुरु हुआ है यह एक शुभसंकेत है। इससे अनेक तथाकथित उदार तथा अभिव्यक्ती स्वातंत्र्य के नामसे दहाड़नेवालें असली चेहरे समाज़ के सामने आ रह़े है। भारी विरोध के बावजूद प्रणवदा अपने निर्णय पर अड़िग है। इतना हि नहीं उन्होने स्पष्ट किया की सभी प्रश्नोके उत्तर वें नागपूर में हीं देंगे। प्रणवदा का तथा आपकी द्रुढता का हम स्वागत करते है।

  • डॉ. मनमोहन वैद्य

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