रामधारी सिंह दिनकर (जन्मतिथि) 23 सितंबर
पटना, 23 सितम्बर। राष्ट्रकवि के रूप में मशहूर रामधारी सिंह दिनकर का जन्म 23 सितंबर, 1908 को बिहार के बेगुसराय जिले के सिमरिया गाँव में हुआ था। इनके पिता रवि सिंह एवं माता मनरूप देवी थी। रामधारी सिंह दिनकर अपने माता-पिता की दुसरी संतान थे। इनके जन्म के दो वर्ष बाद ही इनके पिता का निधन हो गया। परिवार आर्थिक रूप से कमजोर हो गया। इस मुसीबत की घड़ी में अपने लोंगों ने पुरा साथ दिया। जैसे-तैसे भोजन एवं अन्य चीजों की पूर्ती होती थी । इनकी प्रारंभिक शिक्षा गाँव के प्राथमिक विद्यालय में हुई। घर वाले रामधारी सिंह दिनकर को प्यार से नुनुआ कहते थे। इन्होंने मैट्रिक की पढाई मोकामा घाट हाईस्कूल से की। इस समय इनकी उम्र 13 वर्ष थी, इसी समय इनकी शादी सामवती से हो गई। शादी के बावजूद इन्होंने पढाई जारी रखनी चाही ऐसी स्थिति में बड़े भाई बसंत एवं छोटे भाई सत्यनारायण ने अपनी पढाई छोड़कर रामधारी को पढाने का निश्चय किया। ये दोनों मेहनत करके घर का खर्च चलाने लगे और रामधारी सिंह पढ़ने लगे। इन्होंने पटना कॉलेज से इतिहास आनर्स विषय से 4 वर्ष में स्नातक किया। यहाँ पर इनको रामवृक्ष बेनीपुरी, राहुल सांकृत्यायन और काशी प्रसाद जायसवाल जैसे काबिल लोगों से मिलने का मौका मिला। इनकी विचारों की फसल दिन दुनी रात चैगुनी की गति से बढ़ती गई। स्नातक की पढाई पूरी होंने के बाद इन्होंने बरबीघा हाईस्कुल में बतौर हेडमास्टर नौकरी शुरू की, यहाँ इनको 55 रूपए मासिक मिलता था। कुछ समय बाद स्कुल प्रबंधन के मनमुटाव के कारण नौकरी छोड़ दी। 1934-42 तक बिहार सरकार में सब रजिस्ट्रार के पद पर रहें। द्वितीय विश्व युद्ध के समय ये युद्ध प्रचार विभाग में पब्लिसिटि आॅफिसर थे। 1947-50 तक जनसंपर्क विभाग में उपनिदेशक रहें।
रामधारी सिंह दिनकर एवं सामवती को दो बेटे एवं दो बेटियाँथी। बारदोली आंदोलन के दौरान इन्होंने विजय संदेश नाम से कविता संग्रह लिखींजिसे लोगों ने हाथोहाथ लिया। अब धीरे-धीरे इनकी प्रसिद्धि पूरे भारत मे होने लगी। इनकी कविताओं में जोश, ओज एवं देशभक्ति की भावना रहती थी। रीवा से निकलने वाली छात्र सहोदर एवं अन्य पत्रिकाओं में इनकी कवितायें और लेख छपने लगे थे। इनकी एक कविता है- सिंहासन खाली करो की जनता आती है। ब्रिटिश सरकार में नौकरी करते समय 4 वर्ष में इनका 22 बार तबादला हो चुका था। इन्होंने कई बार नौकरी छाडी भी। योगी पत्रिका मे बतौर पत्रकार इन्होंने काम भी किया। राष्ट्रीय चिंताओं पर अनेक लेख लिखें। ये रविन्द्र नाथ टैगौर एवं इकबाल को अपना आदर्श मानते थे। रामधारी सिंह दिनकर हिंदी के प्रबल समर्थक थे। भारत-चीन युद्ध क समय इनकी एक ओज पुर्ण कविता का कुछ अंश रक्त स्नान से भारत शुद्ध हो सकता है, अग्नि स्नान से देश की ताकत बढ़ सकती है। विपतियों के झकोरे से स्वराज जिंदा किया जा सकता हैजो पार्सल से आया था। रश्मिरथि, परशुराम की प्रतिक्षा, उर्वशी इनकी श्रेष्ठ कृतियाँहै। संस्कृत के चार अध्याय इनका सर्वश्रेष्ठ गद्य है। 1952 मे रामधारी सिंह दिनकर राज्यसभा के लिए चुने गए। जब राज्यसभा में ये हिंदी के बारे में बोलते थे तो पुरा सदन इन्हें सुनने के लिए शांत हो जाता था। राजनेताओं की दोहरी मानसिकता पर कहा था कि आप लोग जिस भाषा में फाइल पर नोट लिखते है उस भाषा में वोट माँगकर तो देखे पता चलेगा कि नतीजा क्या होता है। उदयाचल नाम से प्रकाशन संस्था से भी चलाई। भागलपुर विश्वविद्यालय केकुलपति भी रहे। इनकी रचनाओं का कई भाषाओं में अनुवाद भी हुआ। 1959 में साहित्य अकादमी एवंपद्य भुषण तथा 1972 मेंज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किए गए। अंतिम बार इन्होंने रश्मिरथि कविता का पाठ किया। अहिंदी भाषी क्षेत्र होते हुए भी इनको सुनने के लिए काफी भीड़जमा हुई थी। जीवन के अंतिम समय में इन्होंने एक सवाल किया कि सबकुछ पाकर इंसान इतना खाला-खाली क्योंहै ? 24 अप्रैल 1974 को शब्दों का यह सुरज सदा के लिए अस्त हो गया।

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