[button color=”” size=”” type=”3d” target=”” link=””]—दीप्ति शर्मा[/button]

प्रकृति – मातृ स्वरूपा अर्थात् प्रकृति माँ के समान है. भारतीय संस्कृति में प्रकृति को माता माना गया है एवं माँ रहित जीवन की कल्पना हेतु कहा गया है – नास्ति मातृसमा छाया, नास्ति मातृसमा गति:. नास्ति मातृसमं त्राणं नास्ति मातृसमा प्रिया…अर्थात् माँ के समान कोई छाया नहीं है, माँ के समान कोई सहारा नहीं है. माँ के सदृश्य कोई रक्षक नहीं है, और माँ के समान कोई प्रिय नहीं है. यही हमारी संस्कृति है, यही हमारी शिक्षा है और यही हमारे जीवन का आधार है. फिर क्यों हम अपनी माँ से इतने विमुख हो गए? क्यों हम इतने कृतघ्न हो गए? क्यों हमें उस मां के वात्सल्य का ध्यान ही न रहा? उसके द्वारा दी गई अनमोल राशियों का हमने कोई मान सम्मान नहीं किया. जिस प्रकार माँ सदैव ही अपनी संतान का हित चाहने वाले होती है, उससे बिना कोई अपेक्षा किए उसकी समस्त आवश्यकताओं की पूर्ति करती है. इसी प्रकार माँ प्रकृति ने सदैव ही हमारे लिए हितकारी एवं जीवन उपयोगी संसाधन प्रस्तुत किए हैं. हमारी उदर पूर्ति से लेकर शारीरिक एवं मानसिक आरोग्य का प्रबंध किया है. हमें जीवन के विभिन्न भावों एवं रंगों से परिचित करवाया है. व्यापक अर्थ में प्रकृति अर्थात् ब्रह्मांड एवं ब्रह्मांड अर्थात् जीवन, फिर कैसे हम इस प्रकृति, इस ब्रह्मांड से इतने विरक्त हो सकते हैं कि हमारा अस्तित्व ही संकट में आ जाए? कैसे हम एक माँ के बिना उसकी संतान की परिकल्पना कर सकते हैं? माँ अर्थात् जीवन, संतान अर्थात आदाता. जिस संबंध में माँ सदैव देने के लिए तत्पर रहती हो तथा संतान लेने के लिए तो क्या उस संतान का दायित्व नहीं बनता कि वह अपनी माँ को और इस संबंध को सर्वोपरि माने, उसके अस्तित्व को बनाए रखने के लिए सतत प्रयास करता रहे.
हम भी तो प्रकृति की गोद में उसी प्रकार फलते फूलते रहे हैं, जैसे कोई नन्हा शिशु माँ की गोद में अठखेलियां करता है और माँ उस पर अपना सर्वस्व निछावर करती है. हमारे धार्मिक ग्रंथों में ऋषि- मुनियों की वादियों में, कवियों की काव्य रचनाओं में, संतों के अमृत वचन में प्रकृति की महत्ता विद्यमान रही है. विश्व की समस्त सभ्यताओं का विकास प्रकृति की गोद में हुआ है. इसी कारण तो मनुष्य के सबसे निकटतम संबंध हैं प्रकृति से, जो सबसे प्रगाढ़ संबंध हैं. किंतु युग परिवर्तन के साथ ही हमने इस संबंध को दूषित किया है और उसके परिणाम आज हमारे समक्ष हैं. मत्स्य पुराण में प्रकृति की महत्ता को बताते हुए कहा गया है कि सौ पुत्र के समान एक वृक्ष होता है. वहीं अथर्ववेद में हम शपथ लेते हैं कि – हे धरती माँ ! आपसे जो कुछ भी लेंगे, वह उतना ही होगा जितना आप पुनः उत्पादित कर सकें, आपके मर्म स्थल एवं जीवन शक्ति पर हम कभी घात नहीं करेंगे. हमारे पूर्वजों ने प्रकृति को दिए इस वचन को जब तक निभाया, तब तक मानव -सभ्यता सुखी रही, संपन्न रही. रोग- व्याधियों से दूर रहे. किसी भी प्रकार की प्राकृतिक आपदा का सामना नहीं करना पड़ा. किंतु, जैसे ही हमने इस वचन का उल्लंघन किया, उसके विध्वंसकारी एवं विघटनकारी परिणाम उभर कर सामने आए. कहते हैं कि पूत कपूत हो सकता है, लेकिन माता कुमाता नहीं. माँ सदैव ही क्षमा देने वाली होती है, अगर संतान सरल हृदय से अपने द्वारा किए गए अपराधों की क्षमा मांगती है तो, माँ उसे बड़ी सरलता से क्षमा कर देती है. यह हमारे लिए भी क्षमा माँगने का समय है.
जब हम सब माँ प्रकृति से माँगे, उसको उसका खोया हुआ मान- सम्मान वापस दें. उसके महत्व को समझें और उसकी ममता को मान दें, तो आओ प्रकृति वंदन करके अपनी माँ को सम्मान दें क्योंकि हमारी संस्कृति में माँ के समान कोई और पूजनीय नहीं है. माँ का महत्व, माँ का संबंध सर्वोपरि है.
इसी संस्कृति एवं परंपरा का निर्वहन करने हेतु हिन्दू आध्यात्मिक एवं सेवा फाउंडेशन तथा पर्यावरण संरक्षण गतिविधि द्वारा प्रकृति वंदन कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है. जिसमें प्रत्येक कुटुंब के कुटुंबजन 30 अगस्त, 2020 (रविवार) को प्रातः १० बजे से ११ बजे तक अपने घर में लगे वृक्ष अथवा गमले के पौधे की पूजा करेंगे और संकल्प लेंगे कि आजीवन हमें प्रकृति का रक्षण करना है, प्रकृति का वंदन करना है ताकि हमारी यह धरा हरी-भरी रह सके. पादप जगत को उनका सम्मान मिल सके. इस शुभ अवसर पर प्रेरणा स्वरूप राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन जी भागवत का संबोधन होगा.
प्रत्येक भारतवासी को यह प्रण लेना होगा कि इस पावन धरा की रज का एक – एक कण है चंदन, आओ हम सब मिलकर करें – प्रकृति वंदन.

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