प्रदीप गांगुली ( स्टेज मैनेजर, कालिदास रंगशाला)
मुद्दा – बिहार का रंगमंच
1.रंगमंच का क्या अर्थ होता है?

उत्तर:- रंगमंच (थिएटर) वह स्थान है जहाँ नृत्य, नाटक, खेल आदि हों। रंगमंच शब्द रंग और मंच दो शब्दों के मिलने से बना है। रंग इसलिए प्रयुक्त हुआ है कि दृश्य को आकर्षक बनाने के लिए दीवारों, छतों और पर्दों पर विविध प्रकार की चित्रकारी की जाती है और अभिनेताओं की वेशभूषा तथा सज्जा में भी विविध रंगों का प्रयोग होता है और मंच इसलिए प्रयुक्त हुआ है कि दर्शकों की सुविधा के लिए रंगमंच का तल फर्श से कुछ ऊँचा रहता है। दर्शकों के बैठने के स्थान को प्रेक्षागार और रंगमंच सहित समूचे भवन को  रंगशाला, या नाट्यशाला (या नृत्यशाला) कहते हैं। पश्चिमी देशों में इसे थिएटर  नाम दिया गया है।
2.बिहार में रंगमंच की क्या स्थिति है?

उत्तर:- बिहार में रंगमंच की स्थिति बहुत खराब है। इसके प्रति यहाँ की सरकार उदासीन नज़र आती है। सरकार के तरफ से अधिक मदद नहीं मिल पाती है। अगर दूसरे राज्यों की बात की जाए तो महाराष्ट्र सरकार अपने थिएटर और अपने कलाकारों पर पूरा ध्यान देती है।
बिहार में जनता भी इसको लेकर उतनी जागरूक नहीं है। यहाँ की जनता के हिसाब से नाटक देखना समय की बर्बादी है। लेकिन वही जनता 350 रुपये खर्च के सिनेमाघरों में जा कर सिनेमा का लुप्त उठाती है। सबसे अजीबोगरीब स्थिति तब उत्पन्न होती है जब नाटक देखने के लिए टिकट मुफ्त रखी जाती है, तो भी दर्शक देखने नहीं आते हैं। कालिदास रंगशाला पूरे साल में 7 फेस्टिवल का आयोजन करवाती है। परन्तु जो इसके नियमित दर्शक हैं सिर्फ वही देखने आते हैं।
3.दर्शक रंगमंच से अधिक फ़िल्मो की तरफ क्यों आकर्षित होते हैं?

उत्तर:- सिनेमा एक पूर्ण मनोरंजन का साधन है। फ़िल्म बनाने वालों के पास प्रोडक्शन के लिए पैसों की कमी नहीं है। प्रोडक्शन के नाम पर हम थिएटर वालों को भी कभी – कभी सरकार के तरफ से कुछ पैसे मिल जाते हैं। लेकिन यह हर साल नहीं मिलता है। 2009 में कालिदास रंगशाला बन्द होने के कगार पर आ चुकी थी, तब SAIL ने 1 लाख की मदद कर के इसे बंद होने से रोका था।
बिहार में थिएटर कर के उतनी प्रसिद्धि नहीं मिल पाती है। जितनी प्रसिद्धि फ़िल्मो में मिलती है। फ़िल्मो की दुनिया चकाचौंध से भरी हुई है, यह चीज़ रंगमंच नहीं है। रंगमंच करते हुए आप अपना पेट नहीं पाल सकते हैं.
4.अगर रंगमंच की यह स्थिति है, तो फिर कलाकार इस क्षेत्र में इतनी मेहनत क्यों करते हैं?

उत्तर:-‘मायानगरी मुम्बई’, सब के मन मे एक सपना होता है, किसी भी तरह एक बार मुंबई में मौका मिल जाए। जितने भी अच्छे कलाकार हुए है उन सबों ने थिएटर से ही अपनी शुरुआत की है। पंकज त्रिपाठी ने तो यहीं कालिदास रंगशाला में अभिनय करना सीखा था।
5.जनता रंगमंच के प्रति जागरूक हो इसके लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं?

उत्तर:- जनता को जागरूक करने के लिए, हमें अपने नाटकों के अधिक प्रचार की जरूरत है। जिन बच्चों को नाट्यकला में रुचि है उनके लिए हम डिप्लोमा का कोर्स करवाते हैं। आम जनता को भी अपनी धारण बदलनी होगी, कि नाटक देखना समय की बर्बादी है।

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