लेखिका- टुपी जाह्नवी सिंह

”कैसे झुठला पाऊं मैं बार-बार कचोटते स्मृति-संदर्भों को जिनसे मिलती रही तमाम प्रतिकुलताओं से जूझ पाने की शक्ति खुलती रही जिन से विरक्तियों के जंगल से गुजरकर सृजनधर्मी आसक्तियों की राह।“
इन पंक्तियों में मानो हिंदी की उस बेटी की जीवन यात्रा का सार बड़ी सरलता से बयां हो गया है, जिन्हें हम ‘प्रभा खेतान’ के नाम से जानते हैं। प्रभा जी संघर्ष पथ से प्राप्त अनुभव को संबल बनाकर उपलब्धि की ओर रुख करने वाली लेखिका थीं । उनकी जिजीविषा प्रवृत्ति महज़ व्यक्तित्व में ही नहीं बल्किु रचनाओं में भी बखूबी निखर के आई है। प्रभा खेतान एक प्रसिद्ध लेखिका, उपन्यासकार, कवयित्री, प्रबंधकार, स्त्रीवादी चिंतक, विदूषी शोधकर्ता और उद्यमी थी।
1 नवम्बर, 1942 ई. में कलकत्ता के एक मारवाड़ी परिवार में जन्मी प्रभा जी अपने माता-पिता की पांचवीं बेटी थी। प्रभा खेतान का परिवार संकीर्णतावादी हिन्दू परिवार था। जिस कारण उनके परिवार में बेटी को उपेक्षा की दृष्टि से देखा जाता था। इसका दंश प्रभा जी को भी क्षेलना पड़ा।
कलकत्ता चैंबर ऑफ़ कॉमर्स की एकमात्र महिला अध्यक्ष होने का गौरव प्राप्त

‌प्रभा की स्कूली शिक्षा कलकत्ता के ‘बालीगंज शिक्षा सदन` में पूरी हुई। सुप्रसिद्ध साहित्यकार मन्नू भंडारी के सान्निध्य में चौथी से ग्यारहवीं कक्षा तक की पढ़ाई प्रभा ने वहां से पूरी की। प्रभा की दर्शन में बढ़ती रुचि ने उनसे दर्शन का गहन अध्ययन करवाया। आगे चलकर इसी विषय में उन्होंने पी-एच.डी. की। ‘ज्यां पॉल सार्त्र का अस्तित्ववाद` पी-एच.डी. का विषय था। शोध के दौरान प्रभा ने बड़ी गहनता से अध्ययन किया। प्रभा खेतान फाउन्डेशन की संस्थापक अध्यक्षा, नारी विषयक कार्यों में सक्रिय रूप से भागीदार, फिगरेट नामक महिला स्वास्थ्य केन्द्र की स्थापक, 1966 से 1976 तक चमड़े तथा सिले-सिलाए वस्त्रों की निर्यातक, अपनी कंपनी ‘न्यू होराईजन लिमिटेड’ की प्रबंध निदेशिका, हिन्दी भाषा की लब्ध प्रतिष्ठित उपन्यासकार, कवयित्री तथा नारीवादी चिंतक तथा समाज सेविका थीं। उन्हें कलकत्ता चैंबर ऑफ़ कॉमर्स की एकमात्र महिला अध्यक्ष होने का गौरव प्राप्त था। वे केन्द्रीय हिन्दी संस्थान की सदस्या थी
साहित्य की अनेक विधाएं हैं। किसी एक विषय को लेकर लिखते जाना कुछ सहूलियत भरा हो सकता है, मगर विविध विषयों पर कलम चलाना दुष्कर होता है। प्रभा खेतान ने न केवल मन के भावों को व्यक्त करने के लिए लिखा बल्कि विविध विषयों पर उनका चिंतन, शोध दृष्टि, विवेचनात्मक बौद्धिकता और अनुवाद के लिए चुनी गई पुस्तकें साहित्य में उनको उच्च स्थान पर प्रतिष्ठित करते हैं। कविता, कहानी, उपन्यास, अनुवाद, आत्मकथा, चिंतनपरक व शोध साहित्य सभी विधाओं में कलम चलाना प्रभा की योग्यता रही।
सातवीं कक्षा के समय पहली कविता छपी

मात्र 12 साल की उम्र में उन्होंने अपनी पहली कविता सातवीं कक्षा में पढ़ते वक्त लिखी जो ‘सुप्रभात` में छपी, इस कविता से शुरू हुई प्रभा की साहित्य साधना अनवरत रूप से अंत तक चलती रही। जिन प्रमुख रचनाओं ने साहित्य जगत में प्रभा जी का लोहा मनवाया उनमें है- उपन्यास-आओ पे-पे घर चलें, छिन्नमस्ता, एड्स, पीली आंधी, अपने- अपने चेहरे, आत्मकथा- अन्या से अनन्या, चिंतनपरक लेख-उपनिवेश में स्त्री, आदि।
साहस को संबल बनाकर धार के विपरित चलने वाले नाविक का सफर आसान नहीं होता। साहस के कारण वे धारा को अपने मनवाकिफ मोड़ लेते हैं मगर वे धारा के साथ बहने की आदत वालों के दिल का नासूर बन जाते हैं। प्रभा ने मारवाड़ी समाज की रूढ़ियों पर से परदा उठाया और कुंठाओं से घिरी मारवाड़ी स्त्री को एक राह दिखाई। नारी की क्षमता को समाज के सामने उदाहरण के रूप में रखा। प्रभा की सफलता की कहानी उनका आत्मकथ्य बयान करता है- ”मैंने अपने-आप को बचाया है, अपने मूल्यों को जीवन में संजोया। हां, टूटी हूं, बार-बार टूटी हूं,….. पर कहीं तो चोट के निशान नहीं….. दुनियां के पैरों तले रौंदी गई, पर मैं मिट्टी के लोंदे में परिवर्तित नहीं हो पाई। इस उम्र में भी एक पूरी-की-पूरी साबुत औरत हूं, जो जिंदगी को झेल नहीं रही बल्कि हंसते हुए जी रही है, जिसे अपनी उपलब्धियों पर नाज है। दोस्ती का हाथ बढ़ाकर जिसकी गर्म हथेलियां हर किसी को अपने करीब खींच लेती हैं।“
विराट व्यक्तित्व के सामने अनगिनत पुरस्कार पड़ गए फीके

धरातल से शुरू किए अपने जीवन को खुले आकाश की ऊंचाईयों तक पहुंचाने के प्रभा के साहस और क्षमता को कई पुरस्कार-सम्मानों से भी नवाजा गया-रत्न शिरोमणि, इंडिया इंटरनेशनल सोसाइटी फॉर यूनिटी द्वारा,इंदिरा गांधी सॉलिडियरिटी एवार्ड, इंडियन सॉलिडियरिटी काउसिंल द्वारा,टॉप पर्सनाल्टी एवार्ड (उद्योग), लायन्स क्लब द्वारा,महापंडित राहुल सांस्कृत्यायन पुरस्कार, केन्द्रीय हिन्दी संस्थान द्वारा ,बिहारी पुरस्कार, के.के. बिड़ला फाउण्डेशन द्वारा, भारतीय भाषा परिषद व डॉ. प्रतिभा अग्रवाल नाट्य शोध संस्थान द्वारा सम्मान।
हांलाकि ये पुरस्कार और सम्मान उनकी प्रतिभा को आंकने के लिए पूर्ण तो नहीं माने जा सकते फिर भी उनके विराट व्यक्तित्व के ये छोटे-छोटे अवलम्ब अवश्य बनें।
जीवन के इस सफर में अनुभव के आकाश में विचरते हुए दिनांक 20 सितम्बर, 2009 को प्रभा जी सदा के लिए चिरनिंद्रा में चली गई।

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