वर्ष 1937-38 में जवाहरलाल नेहरू ने ‘नेशनल हेराल्ड’ नाम से एक अखबार निकालने का विचार किया और इसके लिए उन्होंने देश के कई शहरों में सरकार से रियायती दर पर जमीन ले ली। इनमें लखनऊ, दिल्ली, मुम्बई, भोपाल, इन्दौर, पटना, पंचकुला जैसे शहर शामिल हैं। इस अखबार का पहला संस्करण 9 सितम्बर, 1938 को लखनऊ से प्रकाशित हुआ था और इसके प्रथम सम्पादक थे जवाहरलाल नेहरू ही थे। इसके कुछ वर्ष बाद दिल्ली संस्करण भी निकला। मजे की बात है कि लखनऊ और दिल्ली संस्करणों के अलावा और कहीं से भी नेशनल हेराल्ड का संस्करण नहीं निकला। लेकिन जहां भी सरकार से जमीन ली गई वहां आलीशान भवन जरूर बनाए गए। आज ये सारे भवन किराए पर चढ़े हुए हैं और इन सबका लाभ प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से काल्पनिक ‘गाँधी परिवार’ को मिल रहा है। भारत छोड़ो आंदोलन 1942 से 1945 तक नेशनल हेराल्ड बन्द रहा, जबकि अख़बारों का छापना उस समय सबसे जरुरी था। इससे ये स्पस्ट हो गया कि आजादी के आंदोलन में नेशनल हेराल्ड जैसा अखबार नाकारा साबित हो गया।
जवाहरलाल नेहरू के प्रधानमंत्री बनने के बाद पुनः नेशनल हेराल्ड को छापा जाने लगा और उसके सम्पादक रामाराव बनाए गए। नेशनल हेराल्ड को हिन्दी में ‘नवजीवन’ और उर्दू में ‘कौमी आवाज’ के नाम से निकाला जाता था। इन तीनों अखबारों को आप विशुद्ध रूप से कांग्रेसी अखबार कह सकते हैं।
1977 के लोकसभा चुनाव में जब इन्दिरा गांधी हार गर्इं तो नेशनल हेराल्ड को 2 वर्ष के लिए बन्द कर दिया गया। इन्दिरा गांधी के बाद राजीव गांधी ने इस अखबार को संभालने की कोशिश की, लेकिन तब तक बहुत कुछ बदल गया था। अखबार निकालने वाली कम्पनी लगातार घाटे पर जा रही थी। इस कारण 1988 में लखनऊ संस्करण को बन्द कर देना पड़ा। केवल दिल्ली संस्करण लगभग 10 वर्ष तक निकलता रहा, लेकिन 1 अप्रैल, 2008 को अचानक दिल्ली संस्करण को भी बन्द करने की घोषणा की गई। नेशनल हेराल्ड की सम्पत्ति को कब्जाने के लिए ही यंग इंडिया कंपनी का गठन भी किया गया था।
हेराल्ड हाऊस का आवंटन राजधानी दिल्ली के आईटीओ स्थित प्रेस एंक्लेव में जिस उद्देश्य के लिए किया गया था। लेकिन कई दशकों से यह धन उगाही का साधन बना हुआ है।

(पांचजन्य)

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