पटना, 1 जुलाई। हिंदी की ऐतिहासिक उपन्यास परम्परा के अग्रणी हस्ताक्षर डॉ. शत्रुघ्न प्रसाद का 1 जुलाई को 88 वर्ष की आयु में पटना में निधन हो गया । वह कुछ दिनों से अस्वस्थ चल रहे थे।
एक आदर्श शिक्षक, एक प्रबुद्ध चिंतक,एक समर्थ कवि,एक सजग संपादक और राष्ट्रीय चेतना से स्फूर्त एक ध्येय निष्ठ व्यक्ति थे । पटना में रहते हुए ‘क्षिप्रा साक्षी है’ और ‘कश्मीर की बेटी’ जैसे कालजयी उपन्यास लिखे। नालंदा, दारा शिकोह, कबीर केन्द्रित उपन्यास लिखे।आपने आपातकाल का दंश भी भोगा था।
‘पिनाक’ और ‘सदा नीरा’ पत्रिका का संपादन किया। भारत सरकार के वरिष्ठ फैलो रहे। वर्ष 2016 में राष्ट्रपति द्वारा गणेश शंकर विद्यार्थी सम्मान से सम्मानित हुए। अखिल भारतीय साहित्य परिषद के कई वर्षों तक राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रहे। अनेक हिन्दी सलाहाकार समितियों के सदस्य भी थे। केन्द्रीय हिन्दी संस्थान की शासी परिषद के सदस्य रहे।

डॉ. शत्रुघ्न प्रसाद

डॉ प्रसाद साहित्य से इतर समाज के विविध क्षेत्रों में भी सतत सक्रिय थे। विश्व संवाद केंद्र के पत्रकार सम्मान समिति के सदस्य थे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बाल स्वयंसेवक थे। संघ के दक्षिण बिहार प्रान्त के संघचालक भी रह चुके थे।आपातकाल में लंबे समय तक जेल में रहे। 1932 में जन्मे डॉ. शत्रुघ्न जी ‘कश्मीर की बेटी’ कृति समेत अन्य रचनाओं के लिए राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित रहे। डॉ प्रसाद अपने पीछे 3 पुत्र और 3 पुत्री समेत भरा पूरा परिवार छोड़ गए हैं।

बिहार के सारण(छपरा) जिले में जन्मे डॉ.  प्रसाद पिछले 60 वर्षों से रचनात्मक साहित्य में सक्रिय थे और पत्रकारिता को दिशा देते रहे, साहित्यिक मार्गदर्शन करते रहे। स्नातक तक की पढ़ाई छपरा में हुई। छपरा के राजेन्द्र कॉलेज से स्नातक करने के बाद पटना विश्वविद्यालय से हिंदी में स्नातकोत्तर की पढ़ाई पूरी की। किसान कॉलेज नालंदा(सोहसराय, बिहारशरीफ) में हिंदी के प्राध्यापक और विभागाध्यक्ष रहे। रचनात्मक साहित्य में उनके योगदान को देखते हुए वर्ष 2016 में उन्हें गणेश शंकर विद्यार्थी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। तत्कालीन राष्ट्रपति श्री प्रणब मुखर्जी ने उन्हें राष्ट्रपति भवन में अप्रैल 2016 में सम्मानित किया था। उन्होंने कई साहित्यकारों को आगे बढ़ाने में सीढ़ी का काम किया। पत्रकारिता के छात्रों को पत्रकारिता और साहित्य के अंतर्संबंधों पर ध्यान देने को कहा। एक तपस्वी की भांति जीवन के 9 वें दशक में होते हुए भी त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका “सदानीरा” का सम्पादन करते रहे। उन्होंने साहित्य में युवाओं की नई पौध तैयार किया और उन्हें फलने-फूलने में मार्गदर्शन करते रहे।

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