लेखिका- टुपी जाह्नवी सिंह
विसंके, पटना, 5 नवंबर। आज ही के दिन 5 नवम्बर 1998 ई. को प्रगतिशील विचारधारा के श्रेष्ठ कवि ‘बाबा नागार्जुन’ (बैद्यनाथ मिश्र) ने संसार को अलविदा कह  दिया।
हिन्दी साहित्य में अपने अनोखे व्यक्तित्व की छाप छोड़ने वाले ‘नागार्जुन’ किसी परीचय के मोहताज नहीं हैं। उनकी रचनाओं में व्यक्त स्पष्टवादी विचारों की तल्खी ही उनकी पहचान है। वे स्वयं कहते हैं-
“प्रतिबद्ध हूँ, जी हाँ, प्रतिबद्ध हूँ –
बहुजन समाज की अनुपल प्रगति के निमित्त संकुचित ‘स्व’ की आपाधापी के निषेधार्थ…
अविवेकी भीड़ की ‘भेड़िया-धसान’ के खिलाफ़…”
इनका जन्म बिहार के मधुबनी के सतलखा में हुआ था, यहां इनका ननिहाल था। इनका पैतृक गांव दरभंगा के तरौनी में था।
बाचपन में ‘ठक्कन मिसिर’ के नाम से परिचित “यात्री” विषम परिस्थितियों के लथार खाते हुए, अनेक भारतीय भाषाओं का ज्ञाता बनकर साहित्य जगत को काव्य के विविध रूप से परिचय करायेंगे, ये किसे पता था! नागार्जुन के जीवन की  विपन्नता मानो प्रतिभा के समक्ष विवश हो गई थी।
‘नागार्जुन’ 20 वीं शताब्दी के महज़ प्रगतिशील विचारधारा के विद्रोही कवि नहीं बल्कि अद्वितीय व्यक्तित्व के धनी थे। उन्होंने मार्क्सवाद और बौद्ध दर्शन का गहन अध्ययन किया था। राहुल सांकृत्यायन और आनंद कौत्सलायन का उन्हें सानिध्य प्राप्त था। वे एक मात्र ऐसे कवि थे जिन्हें हिन्दी, मैथिली और बांग्ला में समान प्रसिद्धि मिली थी।
उन्होंने अपने संपूर्ण जीवन काल में राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय घटनाओं व व्यक्तित्वों पर बेवाक होकर कलम चलाई। हिन्दी कथा साहित्य को उन्होंने ‘बलचनमा’ और ‘ वरूण के बेटे’ जैसी रचनाएं दी। उन्होंने नेहरू, लोहिया, विनोबा से लेकर जय प्रकाश नारायण तक पर लोकप्रिय कविताएं रच डाली।
नागार्जुन अपने एक हैंडलूम के सस्ते झोले में ‘मेघदूतम’ और ‘इकोनोमिक पालिटिकल विकली’ साथ रखते थे।

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