[button color=”” size=”” type=”3d” target=”” link=””]— संजीव कुमार[/button]

पटना, 16 अगस्त।  प्रफुल्ल चंद चाकी, जिसके नाम से अंग्रेज कांपते थे। जो बचपन के कठिन संघर्ष में तपकर कुंदन बने थे। जिन्हें जिंदा पुलिस नहीं पकड़ पाई। चंद्रशेखर आज़ाद जब 2 वर्ष के भी नहीं हुए थे उस समय इस युवक ने अपनी पिस्तौल से प्राणोत्सर्ग कर अंग्रेज के हाथों नहीं मारे जाने का संकल्प पूरा किया। उनकी मृत्यु के बाद उनका सर काट कर सबूत के तौर पर अंग्रेज अधिकारी के सामने प्रस्तुत किया गया था। ऐसे आज़ादी के दीवाने को उनके ही बलिदान स्थल, मोकामा ने ही भुला दिया।

प्रफुल्ल चाकी और खुदीराम बोस ने ही अंग्रेज अधिकारी किंग्सफोर्ड को मारने की योजना बनाई थी। समस्तीपुर स्टेशन पर खुदीराम पकडे गये लेकिन प्रफुल्ल चाकी भागने में सफल हुए। लेकिन मोकामा स्टेशन पर पुलिसने उन्हें घेर लिया। अंग्रेज हुकूमत के हाथों नहीं मरने का संकल्प लिया था। लिहाजा अपनी ही पिस्तौल से आत्मोसर्ग कर दिया।

प्रफुल्ल का जन्म उत्तरी बंगाल के बोगरा जिला (अब बांग्लादेश में स्थित) के बिहारी गाँव में 10 दिसंबर, 1888 को हुआ था। जब प्रफुल्ल दो वर्ष के थे तभी उनके पिता जी का निधन हो गया। उनकी माता ने अत्यन्त कठिनाई से प्रफुल्ल का पालन-पोषण किया। विद्यार्थी जीवन में ही प्रफुल्ल का परिचय स्वामी महेश्वरानन्द द्वारा स्थापित गुप्त क्रांतिकारी संगठन से हुआ। प्रफुल्ल पर स्वामी विवेकानंद काघार प्रभाव था। उन्होंने स्वामी विवेकानंद के साहित्य का गहन अध्ययन किया था। अनेक क्रांतिकारियों के विचारों का भी लगातार अध्ययन किया। इस कारण उनके अन्दर देश को स्वतंत्र कराने की भावना प्रबल हो गई।

बंगाल विभाजन के समय अनेक लोग इसके विरोध में उठ खड़े हुए। अनेक विद्यार्थियों ने भी इस आन्दोलन में बढ़-चढ़कर भाग लिया। प्रफुल्ल ने भी इस आन्दोलन में प्रखरता से हिस्सा लिया। वे उस समय रंगपुर जिला स्कूल में कक्षा 9 के छात्र थे। आन्दोलन में भाग लेने के कारण उन्हें विद्यालय से निष्कासित कर दिया गया।

हालांकि इतिहासकार भास्कर मजुमदार के अनुसार प्रफुल्ल चाकी राष्ट्रवादियों के दमन के लिए बंगाल सरकार के कार्लाइस सर्कुलर के विरोध में चलाए गए छात्र आंदोलन की उपज थे।

पूर्वी बंगाल में छात्र आंदोलन में प्रफुल्ल चाकी के योगदान को देखते हुए क्रांतिकारी बारीद्र घोष उन्हें कोलकाता ले आए जहाँ उनका सम्पर्क क्रांतिकारियों की युगांतर पार्टी से हुआ। उन दिनों सर एंड्रयू फ्रेजर बंगाल का राज्यपाल था जिसने लार्ड कर्जन की बंग-भंग योजना को क्रियान्वित करने में भरपूर उत्साह दिखाया था। फलत: क्रांतिकारियों ने इस अंग्रेज को मार देने का निश्चय किया। अरविन्द के आदेश से समिति के यतीन्द्रनाथ बसु, प्रफुल्ल चाकी के साथ दार्जिलिंग गए, क्योंकि वह राज्यपाल वहीं था परन्तु वहां जाकर देखा गया कि राज्यपाल की रक्षार्थ सख्त पहरा है और कोई उसके पास तक पहुंच नहीं सकता। अतः ये लोग लौट आए और यह योजना सफल नहीं हुई। उसे मारने का दूसरा प्रयास सन् 1907 के अक्तूबर में भी हुआ, जब उसकी रेल को बम से उड़ाने गए अरविन्द घोष के भाई बारीन्द्र घोष, उल्लासकर दत्त, प्रफुल्ल चाकी और विभूति सरकार ने चन्दननगर और मानकुंड रेलवे मार्ग के बीच एक गड्ढा खोदकर उसमें बम रखा, परन्तु वह उस रेल मार्ग से गया ही नहीं। उसी साल 6 दिसम्बर को भी बारीन्द्र घोष, प्रफुल्ल चाकी और दूसरे कई साथियों को लेकर खड्गपुर गए और नारायण गढ़ जाने वाले मार्ग से एक मील दूर खड्गपुर के रेल मार्ग पर एक सुरंग रात के 11-12 बजे के बीच लगायी किन्तु रेल के क्षतिग्रस्त होने पर भी वह राज्यपाल बच गया। 7 नवम्बर, 1908 को भी इसी एंड्रयू फ्रेजर को कलकत्ते के ओवरटून हाल के एक बड़े जलसे में क्रांतिकारी जितेन्द्र नाथ राय ने पिस्तौल से गोली मारने की चेष्टा की, पर 3 बार घोड़ा दबाने पर भी गोली न चलने से वह पकड़े गए और उन्हें 10 वर्ष की सजा मिली।

क्रांतिकारियों को अपमानित करने और उन्हें दण्ड देने के लिए कुख्यात कोलकाता के चीफ प्रेसिडेंसी मजिस्ट्रेट किंग्सफोर्ड को जब क्रांतिकारियों ने जान से मार डालने का निर्णय लिया तो यह कार्य प्रफुल्ल चाकी और खुदीराम बोस को सौंपा गया। दोनों क्रांतिकारी इस उद्देश्य से मुजफ्फरपुर पहुंचे जहाँ ब्रिटिश सरकार ने किंग्सफोर्ड के प्रति जनता के आक्रोश को भाँप कर उसकी सरक्षा की दृष्टि से उसे सेशन जज बनाकर भेज दिया था। खुदीराम मुजफ्फरपुर आकर महाता वार्ड स्टेट की धर्मशाला में दुर्गादास सेन के नाम से और प्रफुल्ल चाकी दिनेशचंद्र राय के छद्म नाम से ठहरे। दोनों ने किंग्सफोर्ड की गतिविधियों का बारीकी से अध्ययन किया एवं 30 अप्रैल, 1908 ई० को किंग्सफोर्ड पर उस समय बम फेंक दिया जब वह बग्घी पर सवार होकर यूरोपियन क्लब से बाहर निकल रहा था। पर दुर्भाग्य से उस बग्घी में मिसेज कैनेडी और उसकी बेटी क्लब से घर की तरफ़ आ रहे थे। उनकी बग्घी का लाल रंग था और वह बिल्कुल किंग्सफ़ोर्ड की बग्घी से मिलती-जुलती थी। खुदीराम बोस तथा उनके साथी प्रफुल्ल चाकी ने उसे किंग्सफ़ोर्ड की बग्घी समझकर ही उस पर बम फेंक दिया था। देखते ही देखते बग्घी के परखचे उड़ गए और उसमें सवार मां बेटी दोनों की मौत हो गई। दोनों क्रांतिकारी इस विश्वास से भाग निकले कि किंग्सफ़ोर्ड को मारने में वे सफल हो गए हैं।

जब प्रफुल्ल और खुदीराम को ये बात पता चली कि किंग्स्फोर्ड बच गया और उसकी जगह गलती से दो महिलाएं मारी गई तो वो दोनों दुखी और निराश हुए और दोनों ने अलग अलग भागने का विचार किया। खुदीराम बोस तो मुज्जफरपुर में पकडे गए और उन्हें इसी मामले में 11 अगस्त, 1908 को फांसी हो गयी। उधर प्रफुल्ल चाकी जब रेलगाडी से भाग रहे थे तो समस्तीपुर में एक पुलिस वाले को उन पर शक हो गया और उसने इसकी सूचना आगे दे दी। जब इसका अहसास प्रफुल्ल को हुआ तो वो मोकामा रेलवे स्टेशन पर उतर गए। लेकिन पुलिस ने पूरे मोकामा स्टेशन को घेर लिया था।

मोकामा में रेलवे की एक पुलिया पर 1 मई, 1908 की सुबह दोनों ओर से दनादन गोलियाँ चल रही थी। जो लोग उस समय वहां रेलवे स्टेशन पर अपनी अपनी गाड़ियों का इन्तजार कर रहे थे, उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा था और जिसको जहाँ जगह मिली वहीँ छुप गया। लगभग ढाई घंटे तक गोलियां चलती रही। एक बहादुर स्वतंत्रता सेनानी अंग्रेज सरकार से ढाई घंटे तक लड़ता रहा। अपने आप को चारों ओर से घिरा जानकर भी उसने आत्मसमर्पण नहीं किया। प्रफुल्ल का संकल्प था कि अंग्रेज उन्हें जीवित नहीं पकड़ पाएंगे। अपने बहादुरी के दम पर कई अंग्रेज पुलिस को घायल कर दिया। लेकिन जब देखा कि आखिरी गोली बची है और अंग्रेज अभी भी चारों और से गोलियाँ चला रहे हैं तो उन्होंने स्वयं का उत्सर्ग अपनी गोली से कर दिया। अंग्रेज भी हक्के बक्के रह गए। जब गोलियों की आवाज़ आनी बंद हुई तो लोगों ने देखा कि पुलिया के उत्तर भाग में एक 20 वर्षीय युवक लहूलुहान गिरा पड़ा है और अंग्रेज पुलिस उसे चारों ओर से घेरे हुए है। कोई कुछ समझ पता उससे पहले ही अंग्रेज उस लड़के की लाश को अपने कब्जे में लेकर चलते बने।

इकलौती संतान होने के बावजूद चाकी ने देश की खातिर अपना बलिदान दे दिया। बिहार के मोकामा स्टेशन के पास प्रफुल्ल चाकी की मौत के बाद पुलिस उपनिरीक्षक एनएन बनर्जी ने चाकी का सिर काट कर उसे सबूत के तौर पर मुजफ्फरपुर की अदालत में पेश किया। यह अंग्रेज शासन की जघन्यतम घटनाओं में शामिल है। चाकी का बलिदान जाने कितने ही युवकों का प्रेरणाश्रोत बना और उसी राह पर चलकर अनगिनत युवाओं ने मातृभूमि की बलिवेदी पर खुद को होम कर दिया| सन 2010 में चाकी के जन्म दिवस पर भारत सरकार ने उनके सम्मान में एक डाक टिकट अवश्य जारी किया था पर इसके अतिरिक्त उनकी स्मृति को अक्षुण बनाये रखने के लिए कुछ नहीं किया गया।

उनके उत्सर्ग स्थली, मोकामा, में कोई स्मृति चिन्ह प्रफुल्ल चाकी की नहीं है। जब बड़े-बड़े स्टेशन का नया नामकारण हो रहा है तो क्या मोकामा स्टेशन पर एक शिलापट्ट भी प्रफुल्ल चाकी की स्मृति में नहीं लगाई जा सकती?

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