बातचीत – छेमी चरिंग (महासचिव, लहासा मार्किट पटना), मुद्दा – लहासा मार्किट के तिब्बत शरणार्थियों की स्थिति
1.तिब्बत का क्या विवाद है?

उत्तर : विस्तारवाद की निति के तहत, चीन ने सन 1949 में तिब्बत में अपना अधिकार जमाना शुरू कर दिया। 1959 में चीन ने तिब्बत पर अपना अधिकार पूर्ण रूप से जमा लिया। दलाई लामा जी को तिब्बत से भागने पर मजबूर किया गया। दलाई लामा के साथ लगभग 1 लाख तिब्बत के लोग भारत में शरणार्थी के तौर पर आये। चीन तिब्बत मूल को खत्म करने के लिए , तिब्बत की लड़कियों को जबरदस्ती पकड़ कर चीनी लड़को से शादी करवाया गया।
भारत देश से ही बुद्ध धर्म की शुरुआत हुई है। दलाई लामा ने इसे गुरु का देश माना और भारत ने भी दलाई लामा और उनके समर्थकों को शरण दिया। जिस कारण चीन ने भारत पर भी आक्रमण किया। भारत देश पर हम बोझ न बने इसके लिए हमने यहाँ की सरकार से काम माँगा। उस वक़्त हमें सड़क बनाने का काम मिला। धर्मशाला में दलाई लामा की सरकार बनी। यहाँ से हमने अपने देश तिब्बत की आज़ादी के लिए एक सरकार गठित की। बाद में भारत सरकार के द्वारा हमें अलग – अलग जगहों पर कॉलोनी बना कर बसाया। आज हम दार्जीलिंग, देहरादून, अरुणाचल प्रदेश, उत्तराखंड इत्यादि जगहों पर हैं। भारत सरकार की मदद से हमे व्यापार करने की अनुमति मिली। आज हमारी पीढ़ी शिक्षित है। रोज़गार की दिक्कत है। इसलिए पंजाब में भारत की बनी ऊनी कपड़ो को ऋण पर लेते हैं। 3 महीनों का भारत सरकार से राजीनामा पत्र लेकर हम भारत के अलग – अलग राज्यों में ऊनी कपड़े बेचते है।
2. भारत और तिब्बत के बीच कैसा सम्बंध रहा है?

उत्तर:- दलाई लामा ने भारत को गुरु देश माना है। बुद्ध धर्म की शुरुआत यहीं से होने के कारण यह हमारा गुरु देश हुआ। 60 वर्षों से अधिक हम यहाँ पर रह रहे हैं। हमें किसी से कभी भी कोई दिक्कत नहीं हुई। इन 60 वर्षों का ही असर है हमारी आज की पीढ़ी अच्छी हिंदी बोल लेती है। जिस दिन तिब्बत समस्या सुलझ जाएगी उस दिन हम सब अपने देश लौट जाएंगे।
3. भारत और तिब्बत के संस्कृति में क्या अंतर देखते हैं?

उत्तर:- तिब्बत एक ठंडा प्रदेश है। वहाँ का मौसम यहाँ से काफी अलग है। पर इतने वर्षों से यहाँ रहने के कारण हम भी गर्म प्रदेश के आदि हो चुके हैं।
तिब्बत के पारिवारिक ढांचे में पुरुष – औरत में कोई भेदभाव नहीं किया जाता है। सब मिल के काम करते हैं। दोनों को एक समान अधिकार प्राप्त हैं।
4. तिब्बत का क्या भविष्य देखते हैं?

उत्तर:- 80 के दशक तक पूर्ण आज़ादी की माँग थी। पर चीन के ताकत और उसकी विस्तारवादी नीति के सामने हमने अपने माँग को बदला। बुद्ध सम्प्रदाय के लोग अहिंसा को मानने वाले होते हैं। इसलिए हम लड़ाई नही चाहते हैं। इसके लिए हमने ‘मध्यम रास्ता’ का सुझाव दिया। जिसमें तिब्बत की मांग यह है कि तिब्बत में सरकार चीन की ही रहे। हमें सरकार में थोड़ी सी जगह और हमारे लोगों को वापस अपने देश में जगह मिल जाए। चीन इस बात पर भी सहमत नहीं हुआ।
5. लहासा मार्किट के बारे में बताइए?

उत्तर:- तिब्बत से जब हम सब को भगाया गया। उस समय हमारे संघ का नाम पड़ा ‘तिब्बती शरणार्थी संघ’। उस समय मेरी आयु 3 वर्ष थी।
भारत देश पर हम बोझ न बने इसके लिए हमने व्यापार करने का सोचा। ताकि व्यापार कर के हम भारत देश को टैक्स दे सके। इस देश के विकास में अपनी सहभागिता दे सकें।
व्यापार करने में इतने बड़ा नाम रखना ठीक नहीं था। लोग बड़े नाम याद नहीं रख पाते हैं। सर्वसम्मति से व्यापार के लिए हमनें “लहासा” नाम चुना। छोटा नाम था, जल्दी लोगों को याद भी हो जाता था। दूसरा कारण यह था , लहासा तिब्बत देश की राजधानी है। हमारी आने वाली पीढ़ी कभी भी तिब्बत में हुए अन्याय को नहीं भूल सके। लहासा नाम हमेशा उन्हें इस बात की याद दिलाती रहेगी।
पटना में हम लोग 3 महीने नवंबर, दिसंबर और जनवरी में आते हैं। पंजाब में बनी ऊनी कपड़ों को ऋण पर लेते हैं। उसे बेचते हैं। पटना में हम लोग 1975 से ऊनी कपड़ों का व्यापार कर रहे हैं। उस समय हम लोग वीणा सिनेमा के सामने फुटपाथ पर अपना समान बेचा करते थे। उसके बाद नगर निगम के तरफ से कृष्णा चौक पर। उसके बाद हम लोग स्टेशन वाला महावीर मंदिर के पास वाले मैदान में पहुँचे। उसके बाद बेउर जेल के पास। 2008 के आसपास हमलोगों को गांधी मैदान में जगह मिली। अब हम लोग श्री सत्यनारायण जी ट्रस्ट फाउंडेशन के द्वारा जगह मिली है।
हमारा यही सोच है फैशन के दौर में पटना के लोग कभी पीछे नहीं रहे। यहाँ के लोग अपना सहयोग ऐसे ही हमेशा देते रहे।

वार्ताकार -अभिलाषा दत्ता 

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