नागपुर. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने वेदों को ज्ञान का भंडार बताया. उन्होंने कहा कि वेदों में भौतिक और आध्यात्मिक दोनों ज्ञान हैं. भारत के पास दुनिया को देने के लिए यह दृष्टिकोण है. विश्व भौतिक नहीं आध्यात्मिक है, और विश्व आध्यात्मिक नहीं भौतिक है. दोनों ही दृष्टिकोण अतिवादी हैं. हम सही, दूसरे गलत हैं ऐसा नहीं होना चाहिए. वेद और विज्ञान एक दूसरे के विरोधी क्यों, पूरक क्यों नहीं हो सकते. वेद ज्ञान का भंडार हैं और अपने ज्ञान का प्रकाश भारत को पूरी दुनिया को देना है. वेद ज्ञान-विज्ञान की कंप्यूटरराइज़ड कोड बुक है. वेदों का ज्ञान प्राप्त करने के लिए तप करना पड़ता है, योग्य होना पड़ता है. क्योंकि अनुभव और पुस्तक में अंतर है. अब तो वैज्ञानिक भी बहुत सी ऐसी रिसर्च कर रहे हैं, जिनको भारत के प्राचीन वैदिक ज्ञान में पहले ही प्रमाणित किया जा चुका है. जैसे कि मृत्यु के बाद भी जीवन है, अधिक तनाव से रोग होते हैं, रोग केवल शारीरिक नहीं मनोवैज्ञानिक भी होते हैं.
सरसंघचालक जी ने नागपुर में वैदिक फिलोसॉफिकल रेमिडिज़ पुस्तक के विमोचन अवसर पर कहा कि भारतीय परंपरा में ज्ञान के अंश हैं, लेकिन हमने खारिज कर दिया और ज्ञान लुप्त हो गया. गुलामी के कारण हमने अपने आपको कम करके आंका. असत्य ज्यादा दिन नहीं चलता. अनुभव और परीक्षण के आधार पर लोग असत्य को खारिज कर देते हैं और सत्य, सत्य रहता है. वेदों में ज्ञान है. वेद का अर्थ ही विद् यानि जानना है. डॉ. भागवत ने पुस्तक के लेखक डॉ. केशव चैन्ना शास्त्री से आग्रह किया कि दशकों की साधना और तपस्या से वेदों से रोगों का उपचार करने का जो ज्ञान उन्होंने प्राप्त किया है, उसे आज की दुनिया जिस भाषा में जिस तरीके से समझती है, उसी तरह, उसी तरीके से उनके सामने रखना होगा. इतनी बड़ी उपलब्धि का यदि आम जन को लाभ न मिले तो ये ज्ञान का भंडार सही से प्रयोग  नहीं हो पाएगा.  तमसो मा ज्योतिर्गमय की राह पर चलना होगा. पूरी दुनिया को ज्ञान का प्रकाश देना होगा.


पुस्तक के लेखक डॉ. चैन्ना शास्त्री ने कहा – वेद केवल वांग्मय नहीं है. पश्चिम ने इनको साहित्य बता कर महत्व कम कर दिया. वेद साहित्य नहीं है, इसलिए सीमित नहीं हैं. पूरे ब्रह्मांड की शक्ति और बीज मंत्रों के रुप में वेदों में निहित है. वेदों से ज्ञान प्राप्त करने के लिए एक विशेष दृष्टि चाहिए.
केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय दिल्ली के वाईस चांसलर प्रोफेसर डॉ. श्रीनिवास वरखेड़ी ने कहा वेदों का ज्ञान श्रुति परंपरा से आगे बढता रहा क्योंकि वेद केवल थ्योरी नहीं, बल्कि प्रयोग भी है. सामान्य लोग प्रयोग करके वेदों से लाभ प्राप्त कर सकते हैं. लेकिन वैज्ञानिक प्रमाण के बिना वैदिक प्रयोगों की मान्यता नहीं है. वैज्ञानिक जब कुछ बताते हैं तो हम मान लेते हैं, वेदों के प्रयोगों को नहीं मानते. हमारा शरीर केवल मात्र शरीर नहीं पूरे ब्रह्मांड का प्रतीक है. जब ब्रह्मांड में परिवर्तन होते हैं तो शरीर में भी होते हैं, दुनिया में भी होते हैं. जैसे कि ओजोन लेयर कम होने, पर्यावरण प्रदूषित होने का हमारे जीवन पर असर पड़ रहा है. ऐसे ही अन्य परिवर्तनों का भी पड़ता है. वेदों में दिए गए उपायों को जानने के लिए आत्म दृष्टि चाहिए. उन्होंने कहा – भारत भंजन केवल भौतिक रूप से नहीं, बल्कि विधाओं के रूप में भी हुआ. सभी विधाओं के ज्ञाता आज हैं भी नहीं. मंत्र, योग, वास्तु, आयुर्वेद, ज्योतिष सब संपूर्ण विधाएं हैं. इनको अच्छे से जानने के लिए एक आत्म दृष्टि चाहिए. भारत की स्वतंत्रता के अमृत वर्ष में अपने ज्ञान के प्राचीन भंडार को पुन: स्थापित करने की दिशा में काम करना होगा.

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