पटना, 19 सितम्बर। स्वाध्याय मंडल के संस्थापक श्रीपाद दामोदर सातवलेकर का जन्म 19 सितंबर 1867 को कहलगाव, रत्नागिरी जिला महाराष्ट्र में हुआ था। वैदिक ज्ञान की शिक्षा इनको परिवार से ही मिली थी। आचार्य श्री चिंतामणी शास्त्री केलकर ने सातवलेकर को संस्कृत व्याकरण की शिक्षा प्रदान की। आगे की पढाई जे0 जे0 स्कूल आॅफ आर्टस से हुई। 1893 में इस कॉलेज में ये प्राध्यापक भी रहे।  इन्होंने अपने करियर की शुरूआत पेंटर एवं फोटोगा्रफर के रूप में शुरू की। पंजाब प्रांत के लाहौर में एक स्टूडियो में इन कलाओं को सीखा। ये मुख्यतः महाराजाओं एवं प्रतिष्ठित व्यक्तियों की पेंटिंग बनाया करते थे।
वेदों का इन्होंने गहन अध्ययन किया था। ऋग्वेद, यर्जुवेद, सामवेद, अर्थववेद को आसानी से समझने के लिए इनपर सुबोध भाष्य लिखा जो कई खंडो मे है। श्रापाद दामोदर सातवलेकर ने हिन्दी में वैदिक धर्म एवं मराठी में पुरूषार्थ पत्रिकाओं का प्रकाशन किया।  श्रीमदभगवत गीता, महाभारत का विवेचन, टिका-टिप्पणी लिखा। इन्होंने 401 ग्रंथों की रचना की।  लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के विचारों से काफी प्रभावित थे। गदर आंदोलन, होमरूल आंदोलन एवं भारत छोडोआंदोलन का खुला समर्थन किया था। सूर्य नमस्कार के प्रस्तावक, वैदिक मूल्यों को जीवन शैली में अपनाने पर जोर देते थेइन पर किताबें भी लिखी। संस्कृत स्वयं शिक्षक पुस्तक की रचना भी की थी।
1936 में श्रीपाद दामोदर सातवलेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुडे। औंध रियासत के संघचालक के रूप में नई शाखाओं का शुभारंभ किया। 16 वर्षो तक इन्होंने संघ का प्रचार प्रसार किया। 1968 में इन्हें पद्य भूषण से सम्मानित किया गया। 31 जुलाई 1968 को 101 वर्ष की उम्र में इनका निधन हो गया।

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