(25जुलाई 1883 -12 सितम्बर 1922)

पटना, 12 सितम्बर। चन्द्रधर शर्मा गुलेरी को हिन्दी के कथाकार, व्यंगकार तथा निबन्धकार के रूप में जाना जाता है। ये कई भाषाओं जैसे- संस्कृत, हिंदी, पाली, लैटिन, बांग्ला, अंग्रेजी, फ्रेंच, प्राकृत के ज्ञाता भी भी थे। इनका जन्म 25 जुलाई 1883 में पुरानी बस्ती नामक स्थान पर जयपुर में हुआ था। ये अपने पिता ज्योतिर्विद महमहोपाध्याय पंडित शिवराम शास्त्री की तीसरी पत्नी लक्ष्मीदेव  की संतान थे। मुल्लत: इनके पिता हिमाचल प्रदेश के गुलेर गांव के निवासी थे। इनके पिता को राज्यसम्मान प्राप्त होने के बाद इनका पूरा परिवार हिमाचल के गुलेर गांव से राजस्थान आकर बस गए। घर में वेद, पुराण, संस्कृति, पूजा-पाठ के वातावरण होने के कारण इस विधाओं को इन्होंने आत्मसात कर लिया था।

प्रयाग विश्वविद्यालय से इन्होंने स्नातक की शिक्षा ली उसके बाद स्नातकोत्तर की शिक्षा कोलकाता विश्वविद्यालय से पूरी करने बाद वो अपनी पढ़ाई जारी रखना चाहते थे, लेकिन कुछ कारणों वस इनको अपनी पढ़ाई छोड़नी पड़ी। लेकिन उन्होंने अपनी स्वाध्याय और लेखन क्षमता को जारी रखा। 20 वर्ष से भी कम उम्र में जयपुर की वेद्यशाला के जीणोद्धार एवं उससे संबंधित शोध कार्य मंडल के लिए चुने गए। 1900 में इन्होंने नागरिक मंच की स्थापना की। 1902 में मासिक पत्र समालोचक के संपादक बने। ऐतिहासिक देवी प्रसाद पुस्तकमाला,सूर्य कुमारी पुस्तकमाला और नागिरी प्रचारिणी पुस्तकमाला का संपादन किया एवं इसके मंडल सभा के सभापति भी रहे।

1916 में इन्होंने मोयो कॉलेज में संस्कृत विभाग के अध्यक्ष का पद संभाला। पं॰ मदन मोहन मालवीय के प्रबंध आग्रह के बाद 1920 में उन्होंने बनारस आकर काशी हिंदू विश्वविद्यालयके प्राच्यविद्या विभाग के प्राचार्य और फिर 1922 में प्राचीन इतिहास और धर्म से सम्बद्ध मनीन्द्र चन्द्र नन्दी पीठ के प्रोफेसर का कार्यभार भी ग्रहण किया।जयपुर के राजपण्डित के कुल में जन्म लेनेवाले गुलेरी जी का राजवंशों से इनका घनिष्ठ सम्बन्ध रहा था।

लेखन विधा के पारंगत चन्द्रधर शर्मा गुलेरी की 12 सितम्बर 1922 को पीलिया एवं तेज ज्वर होने के कारण मात्र 39 वर्ष की अल्पायु में उनका देहावसान हो गया।

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