बिहार के बारे में भले ही कुछ और छवि होगी लेकिन, जमीनी वास्तविकता कोसों दूर होती है। बिहार का एक गांव ऐसा है जहां स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद आज तक कोई प्राथमिकी दर्ज नहीं की गई है। यह गांव पश्चिम चंपारण के गौनाहा प्रखंड का कटरांव है। गांव में किसी प्रकार का विवाद होता है तो लोग आपस में बैठकर ही उसका हल निकाल लेते हैं। पुरूषों के मामले को पुरूष और महिलाओं को मामले महिलाएं सुलझाती हैं। गांव में लोग कोरोना संक्रमण को लेकर बेहद चैकस हैं। शारीरिक दूरी का ख्याल हर किसी को है। हर कोई मास्क लगाकर ही घूमता नजर आता है।
यह प्रखंड वनवासी बहुल है। यहां थारू जनजाति के लोग रहते हैं। थारू जनहाति शांतिप्रिय होते हैं। यहां महिलाओं का काफी सम्मान होता है। घर के किसी भी निर्णय में महिलाओं की सहमति अनिवार्य होती है। सार्वजनिक कार्यक्रमों में अगली पंक्तियां महिलाओं के लिए सुरक्षित रहती हैं। यह समाज दिखावा पसंद नहीं है। पारंपरिक ढंग से ही रहना पसंद करते हैं। यहां के लोग गाड़ियों के काफी शौकीन हैं। पक्के मकान की परंपरा इनके यहां नहीं है। थारू लोगों को सुकून मिट्टी के घरों में ही मिलता है। आजादी के बाद मिले आरक्षण का सर्वाधिक उपयोग थारू जनजाति ने ही किया है। जिला प्रखंड बेतिया हो या गोनहा; लड़कियां झुंड बनाकर पढ़ने जाती हैं। अगर पढ़ाई के सिलसिले में बाहर रहना हो तो 10-15 लड़कियां मिलकर मकान ले लेती हैं। यहां हर घर में नौकरी करने वाले लोग मिल जायेंगे। यहां की लड़कियां भी लड़कों से कम नही है। लड़कियां भी सेवा क्षेत्र में बढ़-चढ़कर योगदान दे रही है।
सार्वजनिक मुद्दों पर यह समाज काफी सजग रहता है। 2018 में गोनहा प्रखंड का यही गांव सबसे पहले खुले में शौचमुक्त हुआ था। स्वच्छता अभियान का अक्षरशः पालन इस गांव में होता है। विवाद को सुलझाने के लिए इनके यहां विशेष पद्धति है। सामान्यतः पुरूषों के झगड़े पुरूषों के द्वारा और महिलाओं के झगड़े महिलाएं सुलझाती हैं। बच्चों के झगड़े में बड़े नहीं पड़ते। परिवार में पत्नी-पत्नी के बीच झगड़ा होता ही नहीं। किसी भी मुद्दे पर पहले चर्चा होती है बाद में आपसी सहमति से निर्णय लिया जाता है। हर वनवासी समाज का एक पारंपरिक प्रमुख होता है। इस पारंपरिक अगुआ को गोमास्ता कहते हैं। गोमास्ता यानि पंच-परमेश्वर। गोमास्ता के साथ कुछ और पंच भी होते हैं। गोमास्ता का निर्णय सर्वोपरि होता है। लगभग 2 हजार वाली आबादी के इस गांव के गोमास्ता अभी विनय महतो हैं। विनय महतो इस गांव की व्यवस्था के लिए अपने पूर्वजों को श्रेय देते हैं। पूर्वजों ने काफी जतन से इस समाज का विकास किया है। इसलिए अपने समाज के प्रति थारू जनजाति काफी सजग रहती है। पूर्वजों के समर्पण के किस्से बच्चों को सुनाये जाते हैं।
समाज में दहेज की प्रथा बिल्कुल नहीं है। सामान्यतः लड़के-लड़की अपने पसंद से जीवनसाथी चुनते हैं और उसकी जानकारी अपने अभिभावकों को देते हैं। फिर दोनों पक्ष के अभिभावक अपने बच्चों की शादी करा देते हैं। इनकी शादियां आडंबरहीन होती हैं। शादी की रस्म घरवाले ही पूरी करते हैं। शादी में गज्जू का विशेष महत्व होता है। सामान्यतः गज्जू लड़का का बहनोई या फूफा होता है। वही शादी की सारी रस्म पूरी करते हैं। थारू समाज की शादी में गज्जू का महत्व लड़के या लड़की से ज्यादा रहता है। समाज में पूरी तरह से नशाबंदी है। कभी इस समाज की पहचान नशे को लेकर ही होती थी। लेकिन, संभवतः महात्मा गांधी की प्रेरणा से समाज ने नशा त्यागने का निर्णय ले लिया। तबसे यह परंपरा आजतक चली आ रही है। गोनहा के भितिहरवा में ही महात्मा गांधी ने अपना सबसे पहला आश्रम बनाया था। दोमाठ के तत्कालीन मुखिया सुषमा देवी ने ही 2013 में नीतीश कुमार को शराबबंदी के लिए खुले मंच से कहा था। 2016 से अगर बिहार शराबबंदी है तो उसका कारण थारू समाज को माना जा सकता है।
इस गांव की जानकारी जब बिहार के पुलिस महानिदेशक गुप्तेश्वर पांडेय को हुई तो वह भी इसे देखने 6 जुलाई को सुबह 8.30 बजे गांव पहुंचे। उन्होंने गांव का भ्रमण किया और सारी चीजों को देखा। मिट्टी के स्वच्छ घर देखकर वे प्रफुल्लित हुए। गांव की व्यवस्था को देखकर वे आश्चर्य में थे। गांव की व्यवस्था के प्रति उनकी प्रतिक्रिया थी कि इस गांव से देश भर के गांव को प्रेरणा लेनी चाहिए। गांव के मुखिया सुनील कुमार गढ़वाल इसका श्रेय अपने पूर्वजों द्वारा दिये गये संस्कार और गांव के लोगों की समझदारी को देते हैं।
– संजीव कुमार

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