भारत के हर गांव की अपनी विशेषता है। लेकिन बिहार के इस गांव की कुछ और विशेषता है। विदेशों में संस्कृत को भले ही सबसे वैज्ञानिक भाषा माना जाता हो परंतु भारत में संस्कृत को पिछड़ेपन की निशानी मानकर कुछ लोग गौरवान्वित होते हैं। ऐसे लोगों को जवाब दिया है बिहार के पश्चिम चंपारण के बगहा बाड़ीपट्टी बनकटवा गांव के नागरिकों ने। यहां के कई परिवारों के बोलचाल की भाषा संस्कृत है। छोटे छोटे बच्चे भी धाराप्रवाह संस्कृत बोलते हैं।
संस्कृत सभी भाषाओं की जननी है। लेकिन, अपने ही देश में उपेक्षित है। इतना कि कोई संस्कृत में बात करता दिख जाए तो हम आश्चर्यचकित हो जाते हैं। वहीं जिले के बगहा प्रखंड के बाड़ीपट्टी बनकटवा निवासी देवनिरंजन दीक्षित के घर में अतिथि का स्वागत हाय हेल्लो से नहीं बल्कि नमो नमः और नमस्कारः से किया जाता है। यहां के कई परिवारों में यह सामान्य बात है। गांव के दर्जनों परिवार में छोटे छोटे बच्चों से बड़े लोगों तक बातचीत का माध्यम संस्कृत भी होता है। इस दुरूह कार्य को संभव कर दिखाया है— देवनिरंजन दीक्षित ने। संस्कृत भारती के इस कार्यकर्ता ने संस्कृत के प्रचार प्रसार में अपने को होम कर दिया है। इसी जिले के एक और लाल हैं संजीव कुमार राय। जिले के मझौलिया प्रखंड स्थित दूधा मठिया गांव निवासी संजीव कुमार राय ने अपना पूरा जीवन ही संस्कृत की सेवा के लिए समर्पित कर दिया है। उनका पूरा परिवार संस्कृत के प्रचार प्रसार के लिए काम करता है। वर्तमान में वे संस्कृत के क्षेत्र में काम करने वाली देश की अग्रणी संस्था संस्कृत भारती के काशी क्षेत्र के संगठन मंत्री के रूप में कार्य कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश में संस्कृत की गतिविधियों को पूरी जिम्मेदारी के साथ निभा रहे हैं।

पिछले वर्ष दिल्ली में संस्कृत विश्वसम्मेलन का आयोजन किया गया था। जिसमें दुनिया के 21 देशों के प्रतिनिधि आए थे। इस कार्यक्रम में देश के उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू की भी उपस्थिति रही थी। कार्यक्रम का संचालन मझौलिया प्रखंड दूधा मठिया गांव निवासी संजीव कुमार राय ने किया था। उनका कहना है कि व्याकरण, शब्द भंडार और वैज्ञानिकता की दृष्टि से भी यह भाषा सर्वश्रेष्ठ है। संस्कृत भारती द्वारा संचालित संवादशाला में लोगों को सरल तरीके से संस्कृत बोलना सिखाया जाता है।
बगहा बाड़ीपट्टी बनकटवा निवासी प्रीति दीक्षित का कहना है कि संस्कृत को लेकर लोगों के मन में गलत भ्रांति है। इसे कठिन विषय माना जाता है। लेकिन, ऐसा है नहीं। उनकी शादी वर्ष 2011 को हुई थी। जब ससुराल आईं तो यहां परिवारजनों को संस्कृत में वार्तालाप करते देख अचंभित हुईं। किंतु महज तीन महीनों के प्रयास में वह संस्कृत में धारा प्रवाह बोलने लगीं। अपने दोनों बच्चों शिवांशदेव दीक्षित(07) एवं रुद्रांश दीक्षित (04) को भी संस्कृत बोलना सीखा दिया है।
थोड़े प्रयास से संस्कृत में बातचीत संभव है। बस प्रयास करने की जरूरत है।

—— संजीव कुमार

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