महाराष्ट्र के भीमा-कोरेगांव में सन् 1818 में एक युद्ध हुआ था जो तत्कालीन ईस्ट इंडिया कंपनी और  पेशवा के सैन्य के बीच हुआ था। इस युद्ध में कथित तौर पर अंग्रेजों की जीत हुई थी जिसकी स्मृति में इस गांव में एक विजयस्तंभ अंग्रेजों ने बनवाया। चूंकि अंग्रेजों की कथित जीत में महार बटालियन का बड़ा हाथ था इसलिए प्रति वर्ष 1 जनवरी को इस विजयस्तंभ को अभिवादन करने हेतु दलित समुदाय के लोग बड़ी संख्या में आते है। स्वयं डॉ. बाबासाहब आंबेडकर ने यहां एक बार अभिवादन किया था। चूंकि महार जाती संविधान के मुताबिक दलित श्रेणी में आती है इसलिए आंबेडकरवादी इस युद्ध को उच्च जाती पर दलितों की विजय के रूप में देखती है। उनके मुताबिक केवल 500 महार ने 28000 पेशवा सैनिकों को मार गिराया था, हालांकि इस कथन को लेकर में एकमत नहीं है।

इस वर्ष इस युद्ध को 200 साल पूर्ण होने के उपलक्ष्य में आयोजन बड़ा होना था। यहां तक की राज्य सरकार ने भी सरकारी स्तर पर इसका आयोजन किया था। लेकिन कुछ संगठनों ने इस अवसर का लाभ उठाते हुए दलित रैली का आयोजन किया जिसका नाम था ‘एल्गार परिषद’। यह रैली 31 दिसंबर को पुणे के शनिवारवाडा में आयोजित हुई जो वास्तव में पेशवाओं की गद्दी का स्थान था। उससे पहले सोशल मीडिया पर पेशवा (ब्राह्मणों) के विरोध में भड़काऊ संदेश भेजे गए।

इस रैली में भारिपा बहुजन महासंघ नेता प्रकाश आंबेडकर, जिग्नेश मेवानी, उमर खालिद, राधिका वेमुला, सोनी सोरी, विनय रतन सिंह (भीम आर्मी,उ. प्र.), मौलाना अब्दुल हामिद अज़हरी(राष्ट्रीय सचिव, आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड) आदि लोग आये थे। इसके पीछे कौन लोग थे इसका अंदाजा आयोजक संगठनों के नामों से हो सकता है –  पोपुलर फ्रंट ऑफ़ इंडिया(PFI), बामसेफ,  मूल निवासी मुस्लिम मंच, छत्रपति शिवाजी मुस्लिम ब्रिगेड, दलित ईलम (ईलम तमिल शब्द है जिसका अर्थ होता है देश) आदि।

इस रैली में जमकर जातिवादी वक्तव्य किए गए। वक्ताओं के अनुसार मुताबिक भाजपा और संघ के लोग ही आज के नए पेशवा है और इनका वही हाल किया जाना चाहिए जो महार बटालियन ने 200 साल पहले पेशवाओं का किया। मेवानी ने कहा, कि दलितों के अधिकार की लढ़ाई संविधानिक मार्ग से नहीं, बल्कि रास्ते पर उतरकर लढ़नी होगी। उमर खालिद ने कहा, कि कोरेगांव की लढ़ाई हमें आगे ले जाने होगी। वे बार बार भाजपा, संघ, मनुवादी और ब्राम्हणों को ताने मार रहे थे, लेकिन उनका लक्ष्य पूरा हिन्दू समाज था।

इसी दौरान एक और घटना हुई। भीमा कोरेगांव के निकट ही वढू बुद्रूक गांव है। भीमा नदी के किनारे स्थित इसी गांव में औरंगजेब ने 11 मार्च, 1689 को छत्रपति शिवाजी महाराज के ज्येष्ठ पुत्र और तत्कालीन मराठा शासक संभाजी राजे भोसले और उनके साथी कवि कलश की निर्मम हत्या की थी। औरंगजेब ने संभाजी महाराज के शरीर के चार टुकड़े करके फेंक दिए थे। बताया जाता है, कि सी गांव में रहनेवाले महार जाति के गोविंद गणपत गायकवाड़ ने मुगल बादशाह की चेतावनी को नजरअंदाज करते हुए संभाजी के क्षत-विक्षत शरीर को उठाकर जोड़ा और उनका अंतिम संस्कार किया। इसके फलस्वरूप मुगलों ने गोविंद गायकवाड़ की भी हत्या कर दी थी। गोविंद गायकवाड़ को सम्मान देने के लिए वढू बुदरक गांव में छत्रपति संभाजी राजे की समाधि के बगल में ही गोविंद की समाधि भी है। लेकिन 30 दिसंबर, 2017 की रात कुछ अज्ञात लोगों ने इस सजावट को नुकसान पहुंचाया और समाधि पर लगा नामपट क्षतिग्रस्त कर दिया। इस संदर्भ में कुछ लोगों पर एट्रासिटी कानून के अंतर्गत मामले दर्ज हुए थे। लेकिन बाद में स्थानीय स्तर पर सुलझा ली गई।

दूसरे दिन यानि 1 जनवरी को  नागरिक बड़ी संख्या में वहां आए थे। लेकिन उसी समय कुछ गड़बड़ हुई। कोरेगांव के नजदीक सणसवाडी गांव के पास कुछ इमारतों से पत्थरबाजी हुई। इसके चलते वहां झड़पें हुई। उसके बाद हिंसक झड़प और आगजनी में एक युवक की मौत हुई। कहा गया, कि वढू की घटना का इस पत्थरबाजी से संबंध था। देखते देखते यह तनाव फैलता गया और दलित और मराठा समुदाय एक-दूसरे के विरोध में दिखाई देने लगे। पुणे, मुंबई समेत कई इलाकों में तनाव बन गया। सोशल मीडिया में पुनः विद्वेषी संदेशों का चलन बढ़ा। हालांकि पुलिस ने छिटपुट घटनाओं का अपवाद कर इस हिंसा का असर फैलने नहीं दिया।

हिंसा के बाद प्रकाश आंबेडकर ने बुधवार को महाराष्ट्र बंद का ऐलान किया। इस हिंसा का ठिकरा उन्होंने संभाजी भिडे और मिलिंद एकबोटे इन दो हिंदुत्ववादी नेताओं के सर फोड़ा। शिव प्रतिष्ठान नामक संगठन के 85 वर्षीय नेता संभाजी भिड़े मराठा सम्राट छत्रपति शिवाजी के अनुयायी हैं और उनके भी भारी संख्या में युवा फॉलोअर्स हैं। उनकी महाराष्ट्र के कोलहापुर में शिव प्रतिष्ठान नाम की संस्था है। वह उन नेताओं में शामिल हैं, जिन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और महाराष्ट्र के कई अन्य नेता भी पसंद करते हैं। चूंकि शिवाजी महाराज के नाम से हिंदुओं में एकता लाने के लिए वे प्रयासरत है, इसलिए वर्षों से वे वामपंथी संगठनों की आंख की किरकिरी बने है।

मुंबई में बंद के दौरान विरोध प्रदर्शनों के संबंध में पुलिस ने 300 लोगों को हिरासत में लिया, साथ ही 16 प्राथमिकी भी दर्ज की। राज्य में कुछ स्थानों पर इंटरनेट सेवाएं बंद की गई। राज्यभर प्रदर्शनकारियों के हमले में महाराष्ट्र राज्य सड़क परिवहन निगम की करीब 200 बसें क्षतिग्रस्त हुई।

महाराष्ट्र सरकार ने केंद्रीय गृह मंत्रालय को जातीय हिंसा पर अपनी रिपोर्ट भेज दी है। खबरों के मुताबिक, सुरक्षा एजेंसियों ने आशंका जताई है, कि इस हिंसा के पीछे शहरी नक्सल काडर का हाथ है।  ‘यल्गार परिषद’ के सीज किए दस्तावेजों के आधार पर एजेंसियों ने यह निष्कर्ष निकाला है।

मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस ने भीमा-कोरेगांव हिंसा की न्यायिक जांच के आदेश दिये है। श्री फड़नवीस ने ऐलान किया है, कि जांच समिति की अध्यक्षता उच्च न्यायालय के वर्तमान न्यायाधीश करेंगे। हिंसा में मारे गये युवक के परिजनों को दस लाख सहायता राशि देने की घोषणा भी फड़नवीस ने की है।

राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ ने इस पूरी घटना की निंदा करते हुए अलग-अलग इलाकों में हो रही जातीय हिंसा को गलत ठहराया है। अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख डॉ मनमोहन वैद्य ने एक बयान में कहा, ‘कोरेगांव, पुणे और महाराष्ट्र के अन्य कई जगहों पर हालिया घटनाएं बहुत दुखद और दर्दनाक हैं। कुछ लोग समुदायों के बीच दुश्मनी और नफरत पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं। ‘

वैद्य ने आरोप लगाया कि, उन्होंने लोगो से एकता और भाई-चारा बनाए रखने की अपील की है। वैद्य ने कहा, ‘आरएसएस जनता में एकता और सद्भाव बनाए रखने की अपील करता है, जो हमेशा से संघ के लिए सर्वोच्च प्राथमिकता रही है।

साभार : विश्र्व संवाद केंद्र (पश्चिम महाराष्ट्र प्रांत) पुणे

By nwoow

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