मद्रास हाई कोर्ट के 1926 ट्रेड यूनियन एक्ट के प्रवधान के तहत राजनितिक पार्टियों के नेताओ को श्रम संगठन में प्रतिनिधित्व नहीं दिया जा सकता है. 1926 में अंग्रेज शासनकाल में बने ट्रेड यूनियन एक्ट के तहत 30 प्रतिशत संगठन के बहार के लोगों की भागीधारी हो सकती है. इस नियम का फायदा उठाते हुए कई राजनीति पार्टिया अलग– अलग श्रम संगठन में पदधारक बने हुए है.

भारतीय मजदूर संघ ने मद्रास हाई कोर्ट के इस फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि तमाम मजदुर संघ आज के समय में राजनितिक पार्टियों का हिस्सा बन कर रह चुकी हैं. वह मजदूरों के लिए न होकर पार्टी विशेष के लिए काम करती है.

बीएमएस के बिनय कुमार सिन्हा ने कहा कि आल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस अपने कर्मचारियों से लोकसभा चुनाव में बेगूसराय से चुनाव लड़ रहे कन्हैया के लिए फण्ड का इंतजाम कर रही है. एक श्रम संगठन पार्टी विशेष के लिए कब से काम करने लगी, यह विचारणीय तथ्य है. बहरहाल बीएमएस ने इस फैसले पर जहाँ ख़ुशी जातई है, वही बाकी श्रम संगठनों ने इस फैसले का विरोध जताया है.

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