बातचीत- भैरव लाल दास (कैथी लिपि शोधकर्ता), मुद्दा- कैथी लिपि
1. लिपि और भाषा में क्या अंतर होता है ?

उत्तर:- लिपि या लेखन प्रणाली का अर्थ होता है किसी भी भाषा की लिखावट या लिखने का ढंग। ध्वनियों को लिखने के लिए जिन चिह्नों का प्रयोग किया जाता है, वही लिपि कहलाती है। लिपि और भाषा दो अलग अलग चीज़ें होती हैं। भाषा वो चीज़ होती है जो बोली जाती है, लिखने को तो उसे किसी भी लिपि में लिख सकते हैं।
2. बिहारी लिपि से प्रसिद्ध कैथी लिपि के उत्त्पत्ति और इतिहास के बारे में बताइए ?

उत्तर:- कैथी लिपि की उतपत्ति ग्यारहवीं शताब्दी में हुई थी। इसका नाम कैथी क्यों पड़ा इसकी सटीक जानकारी उपलब्ध नहीं हैं। कैथी लिपि की विशेषता यह थी उसमें ऊपर की ओर लकीरें नहीं होती थी। यह एक तरह से शॉर्टहैंड लिपि थी।
सामान्यतः आज के समय में कैथी लिपि को मैथिली लिपि मान लेते हैं। लेकिन यह बिल्कुल गलत है। मिथिलाक्षर की अपनी एक अलग लिपि है, और कैथी एक अलग लिपि है।
लिपि के इतिहास में सबसे पहले ब्राह्मणी लिपि उसके बाद खरोष्ठी लिपि आती है। उसके बाद कुटिलाक्षय लिपि का आगमन हुआ। कुटिलाक्षय लिपि के बाद कैथी लिपि की शुरुआत हुई। कैथी लिपि का क्षेत्र काफी दूर तक फैला हुआ था। पूरा बिहार, बंगाल के मालदा, झारखंड, पूर्वी उत्तरप्रदेश तक इस लिपि को जानने वाले लोग मौजूद थे। उस समय कैथी लिपि से ही मगही, भोजपुरी, मैथली, अंगिका, बज्जिका एवं खड़ी भाषा लिखी जाती थी।
विद्वानों की लिपि संस्कृत थी। उस समय साक्षरता काफी कम थी। इस कारण कैथी लिपि का उपयोग सिर्फ साक्षर लोग कर पाते थे। विद्यालयों में इस लिपि की पढ़ाई करवाई जाती थी। हर साक्षर लोग इस लिपि को जानते थे।

3.कैथी लिपि के विलुप्तप्राय होने के पीछे क्या कारण प्रमुख थे ?

उत्तर:-अंग्रेजो के शासनकाल में इसकी शुरुआत हुई। 1890 ईसवी में कैथी लिपि को ख़त्म करने का कुचक्र चलाया गया। जबकि 1880 में एक अंग्रेज ग्रियर्सन ने कैथी लिपि का फॉन्ट तैयार करवाया था। अंग्रेजों की ‘फुट डालो और राज करो कि नीति’ पर अंग्रेजो ने यह अपवाह फैला दी कि यह सिर्फ कर्ण कायस्थों की लिपि है। उस समय बही खाता देखने का कार्य कायस्थों का होता था।
अंग्रेजो ने आम लोगों के दिमाग में यह डालना शुरू किया कि कायस्थ इस लिपि का फायदा उठा कर बही खाते में कुछ भी लिख देते हैं। जिसे आम जनजीवन पढ़ने में असमर्थ रहते है। इस बात को तूल देते हुए कुछ लोगों ने इसका विरोध शुरू किया। 1930-1935 आते – आते यह लिपि खत्म होने के कगार पर आ चुकी थी। आज़ाद भारत का पहला जनगणना रिपोर्ट 1952 में आया जिसमें कैथी लिपि का कहीं भी जिक्र नहीं था।
4.कैथी लिपि के इस तरह खत्म हो जाने से किन समस्याओं का सामना करना पड़ा ?

उत्तर:- यूनेस्को अपने रिपोर्ट में लिख चुकी है , “जब एक लिपि विलुप्त होती है, तो उसके साथ – साथ एक पूरी संस्कृति और इतिहास विलुप्त हो जाती है”। कैथी का इस तरह अचानक खत्म हो जाना एक बहुत बड़ी मुसीबत बन के सामने आयी।
इस लिपि को जानने वाली पीढ़ी ने अपने आने पीढ़ी को इस लिपि से अवगत नहीं करवाया। और न ही इस लिपि में रखे दस्तावेजों को दूसरे लिपि में अनुवाद करवाया।
भारत में सबसे अधिक विवादित जमीन बिहार में है। इसका मुख्य कारण है कैथी लिपि। जमीन के सभी पुराने कागज़ात कैथी लिपि में है, जिसे पढ़ने वालों की संख्या न के बराबर है। 50%-80% तक पूरखों की ज़मीन के कागज़ कैथी लिपि में है।
जमीन से जुड़ा कोई भी विभाग इन कागज़ों को नहीं पढ़ पाता है। न बैंक इन कागज़ों को देख कर लोन दे पाती है। न ही ज़मीन विवाद के मामले में न्यायालय न्याय कर पाता है।
बिहार में तंत्र मंत्र की किताबें, लोक गीत यहाँ तक कि सूफी गीत भी कैथी लिपि में लिखी जा चुकी है। राजेन्द्र प्रसाद अपने पत्नी को कैथी लिपि में ही चिट्ठी लिखा करते थे। भिखारी ठाकुर और महेंद्र मिश्र को जानना है तो आपको कैथी जानना होगा। कर्ण कायस्थ के पँज्जी व्यवस्था की मूल प्रति भी कैथी लिपि में दरभंगा महाराज के संग्रालय में सुरक्षित है।
5.कैथी लिपि के संरक्षण के लिए क्या सब किया गया है ?

उत्तर:- कैथी लिपि के संरक्षण से पहले हमें एक बार इसके इतिहास को देखना होगा। 1826 में कैथी लिपि में बाइबिल प्रकाशित हुई थी। बाद में यही अँग्रेजी हुकूमत ने इसके खिलाफ लोगो मे विद्रोह की भावना जागृत की। कैथी लिपि को कर्ण कायस्थों की लिपि मान कर विरोध करने वाले भी इस लिपि में लिखते थे। सन 1917 में चंपारण आंदोलन में राजकुमार शुक्ल ने गाँधीजी के साथ कैथी लिपि में पत्राचार किया था। मुस्लिम, हिन्दू और ईसाई तीनों इस भाषा के जानकार थे। यह पूर्ण रूप से झूठ था कि इस लिपि के जानकार सिर्फ कर्ण-कायस्थ हैं।
कैथी लिपि को कैसे बचाया जाए इसके लिए मैंने 2007 – 2009 तक इसपर अध्ययन किया। उसके बाद 2010 में “कैथी लिपि का इतिहास” नामक पुस्तक प्रकाशित करवायी। इस किताब में कैथी लिपि का इतिहास, कैथी का विकास यात्रा, कैथी लिपि को लेकर जो भ्रांतियां है उसके बारे जानकरी है।
2010 के बाद मैंने प्रण किया इस लिपि को मरने नहीं देना है। कैथी लिपि से जुड़े तमाम दस्तावेजों को उन्होंने अनुवाद करना शुरू किया। एक हज़ार लोगों को मुफ्त में इस लिपि का ज्ञान देने का संकल्प किया। आज के समय में तीन सौ पचास से अधिक लोगों को इस लिपि का ज्ञान दे चुका हूँ। पटना के पुरातत्व विभाग में इस लिपि के जानकार हो, इसका प्रयास हो रहा है। कंप्यूटर पर इस लिपि की फॉन्ट विकसित करने के लिए ‘सी-डैक’पुणे में काम हो रहा है।
मिथिला यूनिवर्सिटी में इसकी पढ़ाई शुरू हो चुकी है। पटना यूनिवर्सिटी भी इस लिपि की पढ़ाई शुरू करने पर विचार कर रही है।
बिहार में ज्यूडिशियल परीक्षण में कैथी लिपि का परीक्षण की शुरुआत हो चुकी है। बिहार सरकार इसे अपनी राज्य लिपि घोषित कर दे , इसके लिए अधिक सँख्या में बिहार सरकार को पत्र लिखा जा चुका है।
(भैरव लाल दास कैथी लिपि शोधकर्ता एवं बिहार विधान परिषद् में प्रोजेक्ट ओफ्फिसर है।)
वार्ताकार- अभिलाष दत्ता

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