“आप दुनिय को यह दिखाएं कि क्रांतिकारी अपने आदर्शों के लिए मर ही नहीं सकते, बल्कि जीवित रहकर जेलों की अँधेरी कोठरियों में हर तरह का अत्याचार भी सहन कर सकते है.”
यह पंक्तियाँ उस महान क्रांतिकारी के लिए भगत सिंह ने लिखी थी जो मौत सी सजा नहीं मिलने से नाराज थे. जिनसे आजादी के बाद भी स्वतंत्रता सेनानी होने का सर्टिफिकेट मांगा गया था और भगत सिंह द्वारा भेजे गये पत्र ने स्वतंत्रता सेनानी होने का प्रमाण पटना के कमिश्नर के सामने पेशी किया. हालांकि बाद में तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद को जब यह बात पता चली तो कमिश्नर ने उनसे माफ़ी मांगी.
जी हाँ मैं 18 नवम्बर, 1910 को बंगाली कायस्थ परिवार में जन्म लेने वाले बटुकेश्वर दत्त की बात कर रहा हूँ. जिनका पैत्रिक गाँव बंगाल के बर्दवान जिले में था, पिता गोष्ठ बिहारी दत्त कानपुर में नौकरी करते थे. इस कारण उनकी स्नातक स्तरीय शिक्षा पी.पी.एन. कॉलेज, कानपुर में सम्पन्न हुई। उन्होंने 1924 में मैट्रिक की परीक्षा पास की इसी दौरान उनके माता व पिता दोनों ने साथ छोड़ दिया. लेकिन भारत माँ की सेवा उनके भाग्य में लिखा था इसी दौरान वे सरदार भगत सिंह और चन्द्रशेखर आज़ाद के सम्पर्क में आए और क्रान्तिकारी संगठन ‘हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसियेशन’ के सदस्य बन गए और बम बनाने में कुशल होने के कारण आगरा में एक बम फैक्ट्री बनाई गई जिसमें बटुकेश्वर दत्त ने अहम भूमिका निभाई.
क्रांतिकारियों को सबक सिखाने के उद्देश्य से ब्रिटिश सरकार ने ‘पब्लिक सेफ़्टी बिल’ और ‘ट्रेड डिस्प्यूट बिल’ केन्द्रीय असेम्बली में पास कराना चाहती थी लेकिन 8 अप्रैल, 1929 ई. को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने दर्शक दीर्घा से केन्द्रीय असेम्बली के अन्दर बम फेंककर इस बिल का विरोध किया. भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त दोनों गिरफ्तार हुए और उन पर मुक़दमा चलाया गया. हालांकि मोटे तौर पर कोर्ट ने ये मान लिया कि बम किसी की जान लेने के इरादे से नहीं फेंका गया था। ऐसे में बटुकेश्वर दत्त को काला पानी की सजा हुई, लेकिन भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु के सर पर सांडर्स की हत्या का इल्जाम भी था, इस लिए उन्हें फांसी की सजा सुना दी गई। बटुकेश्वर दत्त इस फैसले से निराश हो गए.
बटुकेश्वर दत्त को आजीवन कारावास काटने के लिए काला पानी जेल भेज दिया गया। जेल में ही उन्होंने 1933 और 1937 में ऐतिहासिक भूख हड़ताल की। सेल्यूलर जेल से 1937 में वे बांकीपुर केन्द्रीय कारागार, पटना में लाए गए और 1938 में रिहा कर दिए गए। काला पानी से गंभीर बीमारी लेकर लौटे बटुकेश्वर दत्त फिर गिरफ्तार कर लिए गए और चार वर्षों के बाद 1945 में रिहा किए गए.
आज़ादी के बाद नवम्बर, 1947 में अंजली दत्त से विवाह करने के बाद बटुकेश्वर दत्त पटना में रहने लगे और परिवार का पेट भ्क्रने और दो वक्त की रोटी की जुगाड़ में सिगरेट कंपनी में एजेंट से लेकर बिस्कुट और डबलरोटी का बनाने का भी काम किये.
बटुकेश्वर दत्त को अपना सदस्य बनाने का गौरव ‘बिहार विधान परिषद’ ने 1963 में प्राप्त किया.
1964 में बटुकेश्वर दत्त अचानक बीमार पड़े. पटना के सरकारी अस्पताल पटना मेडिकल कॉलेज में उनका प्राथमिक उपचार वहां के सीनियर डॉ. मुखोपाध्याय के द्वारा किया गया. लेकिन हालत में कोई सुधर नहीं हो रहा था. इस पर उनके मित्र चमनलाल आजाद ने एक लेख में लिखा, ‘क्या दत्त जैसे कांतिकारी को भारत में जन्म लेना चाहिए, परमात्मा ने इतने महान शूरवीर को हमारे देश में जन्म देकर भारी भूल की है. खेद की बात है कि जिस व्यक्ति ने देश को स्वतंत्र कराने के लिए प्राणों की बाजी लगा दी और जो फांसी से बाल-बाल बच गया, वह आज नितांत दयनीय स्थिति में अस्पताल में पड़ा एड़ियां रगड़ रहा है और उसे कोई पूछने वाला नहीं है.’
इस लेख के बाद राजनीति के गलियारों में थोड़ी हलचल हुई. तत्कालीन केंद्रीय गृहमंत्री गुलजारी लाल नंदा और पंजाब के मंत्री भीमलाल सच्चर ने आजाद से मुलाकात की. पंजाब सरकार ने बिहार सरकार को मात्र एक हजार रुपए का चेक भेजकर वहां के मुख्यमंत्री केबी सहाय को लिखा कि यदि पटना में बटुकेश्वर दत्त का इलाज नहीं हो सकता तो राज्य सरकार दिल्ली या चंडीगढ़ में उनके इलाज का खर्च उठाने को तैयार है.
इस पर बिहार सरकार की नींद खुली. दत्त के इलाज पर ध्यान दिया जाने लगा. मगर तब तक उनकी हालत बिगड़ चुकी थी. 22 नवंबर 1964 को उन्हें दिल्ली लाया गया. बटुकेश्वर दत्त को सफदरजंग अस्पताल में भर्ती किया गया. बाद में पता चला कि उनको कैंसर है और उनकी जिंदगी के कुछ ही दिन बाकी हैं. कुछ समय बाद पंजाब के मुख्यमंत्री रामकिशन उनसे मिलने पहुंचे और उनको कुछ देने की इच्छा जाहिर की. छलछलाती आंखों के साथ बटुकेश्वर दत्त ने मुख्यमंत्री से कहा, ‘मेरी यही अंतिम इच्छा है कि मेरा दाह संस्कार मेरे मित्र भगत सिंह की समाधि के बगल में किया जाए.’
उनकी हालत लगातार बिगड़ती गई. 17 जुलाई को वे कोमा में चले गये और 20 जुलाई 1965 की रात 1 बजकर 50 मिनट पर उनका देहांत हो गया. बटुकेश्वर दत्त की अंतिम इच्छा को सम्मान देते हुए उनका अंतिम संस्कार भारत-पाक सीमा के करीब हुसैनीवाला में भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव की समाधि के पास किया गया. लेकिन आज भी वे भेदभाव के शिकार से पीड़ित है.

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