राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह डॉ. मनमोहन वैद्य ने कहा कि भारत को स्वतंत्रता मिले 74 वर्ष हो गए हैं. 15 अगस्त, 1947 को स्वराज्य तो प्राप्त हुआ, लेकिन हम सही मायने में स्वतंत्र नहीं हुए. राज्यकर्ता तो हमारे आ गए, ये बहुत बड़ी उपलब्धि थी छोटी बात नहीं. लेकिन, स्वराज्य, स्वतंत्र में जो स्व शब्द है, इस स्व को ही हमने व्याख्यायित नहीं किया, इसका दुर्लक्ष्य किया. इसलिए आजादी के बाद ही भारत की विदेश नीति, रक्षा नीति, शिक्षा नीति, अर्थ नीति, की दिशा ही बदल गई जो भारत के स्व की तरफ नहीं आई. उल्टा अपना जो स्व है, सदियों से जो भारत है, भारत की आध्यात्मिक पहचान है. उस पहचान को नकारना यानि अपने आप को लिबरल, इंटलैक्चुअल और प्रोग्रेसिव कहना, ऐसा फैशन चल पड़ा. बाद में ये लोग अपने आप को सेकुलर भी कहलाने लगे. ये सेकुलर भी नहीं होते, लिबरल भी नहीं होते, लेकिन आज भी कहते नहीं थकते अपने आप को. इसकी दिशा बदलने का समय आया है. 2014 के बाद विदेश नीति बहुत बड़ा में शिफ्ट आया है, रक्षा नीति में चेंज आया है. बहुत चर्चा के पश्चात नई शिक्षा नीति आई है.
हिन्दी विवेक पत्रिका द्वारा आयोजित ऑनलाइन साक्षात्कार श्रृंखला – आत्मनिर्भर भारत में डॉ. मनमोहन वैद्य ने कहा कि आत्‍मनिर्भर भारत का लक्ष्‍य प्राप्‍त करने के लिए सबसे पहले आत्‍मविश्‍वास होना आवश्यक है. आत्‍मनिर्भर शब्‍द दो शब्‍दों से मिलकर बना है ‘आत्‍म’ और ‘निर्भर’. इसमें सबसे पहले हमें ‘आत्‍म’ शब्‍द यानी स्‍वयं को ही समझना होगा. हमारी परंपराएं और विरासत दुनिया में सर्वश्रेष्‍ठ और समृद्ध रही हैं. हमें उन्‍हें पहचानना होगा. उसके आधार पर ही हम आत्‍मनिर्भरता के लक्ष्‍य को प्राप्‍त कर सकते हैं.
उन्होंने कहा कि सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के समय तत्‍कालीन राष्‍ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने कहा था कि मंदिर की तो प्राणप्रतिष्‍ठा हो गई, लेकिन मैं मंदिर का निर्माण पूरा तभी मानूंगा जब हम अपने सामाजिक और सांस्‍कृतिक मूल्‍यों की भी प्राण प्रतिष्‍ठा करेंगे. आज भारत के लिए जरूरी है कि वह ‘आत्‍म’ को पहचान कर योजनाएं बनाए. हमारी बहुत समृद्ध विरासत रही है. पश्चिम के ग्‍लोबलाइजेशन के चक्‍कर में हम अपनी परपंराओं को भूल गए, आत्‍म शक्ति को भूल गए. ग्‍लोबलाइजेशन का विचार मूलत: विकसित देशों के शोषण पर आधारित है. हम तो मानते हैं कि हरेक देश को आत्‍मनिर्भर होना चाहिए. हर देश अपनी क्षमता के अनुसार अपने को खड़ा करे और जहां उसे जरूरत हो परस्‍पर अवलंबन के आधार पर विश्‍व व्‍यापार की गतिविधियां हों. आत्‍मनिर्भर होने का अर्थ क्‍वारेंटाइन हो जाना नहीं है, हम अपनी जरूरत की चीजें अपने सामर्थ्‍य और अपनी मेधा एवं मेहनत के बल पर तैयार करें और जिसे नहीं कर सकते, उसे ही बाहर से लाएं.
सह सरकार्यवाह ने कहा कि आज भारतीय समाज और राजनीति की निर्णय शक्ति सही दिशा में जा रही है. देश में जो राजनीतिक परिवर्तन हुआ है, वह उससे पहले हुए सामाजिक परिवर्तन का ही परिणाम है. राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ के तत्‍कालीन सरसंघचालक बाला साहब देवरस से एक बार किसी ने पूछा था कि हमने गोहत्‍या का मामला उठाया उसे छोड़ दिया, 370 का मामला उठाया उसे भी छोड़ दिया, क्‍या राम मंदिर मामले का हश्र भी ऐसा ही होगा, तो देवरस जी ने जवाब दिया था कि वास्‍तव में ऐसे आंदोलनों से राष्‍ट्रीय चेतना जाग्रत होती है. जैसे-जैसे राष्‍ट्रीय चेतना का स्‍तर बढ़ेगा, उन्‍नत होगा तो हो सकता है सारे प्रश्‍नों का सामाधान एक साथ ही हो जाए. आज हम देवरस जी के कथन को सत्‍य होता हुआ देख रहे हैं. वास्‍तव में किसी भी राष्‍ट्र के विकास में अनेक छोटी-छोटी प्रक्रियाएं समानांतर रूप से चलती रहती हैं और अचानक एक दिन वे सब मिलकर एक बहुत बड़े फलित के रूप में हमारे सामने आती हैं.
05 अगस्‍त को के कार्यक्रम के बारे में चर्चा करते हुए कहा कि राम मंदिर सिर्फ एक मंदिर नहीं है. वह भारतीय अस्मिता और गौरव का प्रतीक है. अतीत में उस स्‍थल को जबरदस्‍ती विवाद का विषय बनाया गया जो इस्‍लामिक मान्‍यताओं के अनुरूप भी ठीक नहीं था. मंदिर का भूमिपूजन अतीत के गौरव की पुनर्स्‍थापना है. वह भगवान राम के जीवन चरित को आदर्श के रूप में अपनाने का प्रतीक है. राम सर्वसमावेशी हैं और हमारा समाज भी वैसा ही होना चाहिए. इस मंदिर से भारतीय मानस में आत्‍मगौरव का भाव जाग्रत होगा.
नई शिक्षा नीति को लेकर मनमोहन वैद्य ने कहा कि इसकी बहुत लंबे समय से प्रतीक्षा थी. मातृभाषा में आरंभिक शिक्षा समाज को जोड़ने और सर्वसमावेशी बनाने में सहायक होगी. यह भावी पीढ़ी को देश की समृद्ध विरासत से एकात्‍म करेगी. किसी भी वृक्ष की ऊंचाई और उसका फलना फूलना इस बात पर निर्भर करता है कि उसकी जड़ें कितनी गहरी हैं. हमें अपनी जड़ों की ओर ध्‍यान देना होगा. अभी केवल नीति आई है, शिक्षा को संचालित करने वाला तंत्र वही है. हमें उस तंत्र और उसके मानस को भी बदलना होगा. हमें लगता है कि यह नीति नए भारत के निर्माण में सहायक होगी. भारत इस नीति के माध्‍यम से व्‍यक्ति और पर्यावरण को साथ लेकर समाज के समन्वित विकास की दिशा में अग्रसर हो सकेगा.
उन्‍होंने कहा कि युवा वही है जो चुनौतियों को स्‍वीकार करे. हमें अब नए प्रयोग और अनुसंधान करने की क्षमता विकसित करने पर ध्‍यान देना होगा. अब तक एक ढर्रे में चीजें चल रही थीं, उन्‍हें बदलकर नए प्रयोग और नई चुनौतियों को खोजना होगा, उन्‍हीं में से अवसर भी पैदा होंगे और हमारे पुरुषार्थ से भारत का भविष्‍य तय होगा.
कृषि व ग्रामीण भारत पर कहा कि तकनीक के माध्यम से किसानों की मदद करने के प्रयास अधिक से अधिक होने चाहिए. जो लोग तकनीक जानते हैं, वे किसानों और ग्रामीण जनजीवन की सहायता के लिए आगे आएं. इससे गांव के लोगों को गांव में ही रोजगार मिलेगा. भारत में प्रतिभा की कमी नहीं है. हम जब अमेरिका द्वारा तकनीक देने से इनकार करने पर परम जैसा सुपर कंप्‍यूटर बना सकते हैं तो हमारी प्रतिभा और मेधा में क्‍या कमी होगी?
कोरोना संकट पर उन्होंने कहा कि स्‍वस्‍थ समाज, व्‍यक्ति और राष्‍ट्र दोनों के लिए जरूरी है. इस काल में जहां कई संकट आए हैं तो कुछ अच्‍छी बातें भी हुई हैं. जैसे हम बहुत ज्‍यादा बहिर्मुखी होकर अपने घर परिवार को ही भूल गए थे. कोरोना ने परिवार को एक होने और परिवार के सदस्‍यों को एक-दूसरे को जानने समझने का अवसर दिया है. बाहर का जंक फूड खाने के बजाय लोगों ने घर का खाना अपनाया है.
संकट काल में राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ की भूमिका की चर्चा करते हुए कहा कि इस संकट में संघ के 5 लाख से अधिक स्‍वयंसेवकों ने करोड़ों लोगों तक मदद और राहत पहुंचाने का काम किया है. इसमें राशन और आवश्‍यक वस्‍तुएं पहुंचाने से लेकर हर तरह की मदद शामिल है. यह भूकंप या बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदा में की जाने वाली गतिविधि नहीं थी. सभी को मालूम था कि कोरोना बहुत संक्रामक बीमारी है और जो लोग समाजसेवा के काम में लगे हैं, वे खुद भी इस बीमारी की चपेट में आ सकते हैं. लेकिन स्‍वयंसेवकों ने अपनी जान की परवाह किये बिना जरूरतमंदों की मदद की. उनका कार्य अभिनंदनीय है.
शाखा के माध्‍यम से समाज में इस भाव का ही विस्‍तार होता है कि सभी अपने हैं. मूल बात है सेवा. समाज ने यदि हमें कुछ दिया है तो हमें भी समाज को लौटाना है, यह भाव बना रहना चाहिए और संघ यही शिक्षा देता है. इससे समाज का तानाबना मजबूत होता है. समाज की सेवा करना और समाज को लौटाने का यही भाव हमारी शिक्षा का भी अनिवार्य अंग होना चाहिए, स्‍कूल से लेकर कॉलेज तक. गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने कहा था कि भारत कभी ‘वेलफेयर स्‍टेट’ नहीं रहा. यहां तो समाज ही सर्वोपरि रहा है. यदि हम युवा पीढ़ी को समाज के प्रति जवाबदेह बनाने के संस्‍कार दें तो समाज की ताकत बढ़ेगी.
चीन की विस्‍तारवादी नीति और पाकिस्‍तान प्रोयोजित आतंकवाद के सवाल पर मनमोहन वैद्य ने कहा कि संघ का स्‍पष्‍ट मानना है कि विस्‍तारवाद तो आज की दुनिया में किसी का भी नहीं चलेगा. चीन की विस्‍तारवादी नीतियों से अनेक देश त्रस्त हैं. लेकिन चीन के भीतर भी हालात ठीक नहीं हैं. वहां की आर्थिक स्थिति भी जल्‍दी ही खराब हो सकती है. आने वाले दिनों में हमें चीन के भीतर ही बड़े परिवर्तन देखने को मिल सकते हैं.
जहां तक पाकिस्‍तान का सवाल है, भारत का विरोध करना वहां की राजनीति की जरूरत हो सकती है. लेकिन जरूरी नहीं कि पाकिस्‍तान की जनता भी ऐसा ही चाहती हो. हमारी जड़ें तो एक ही हैं. इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि हम उन जड़ों को मजबूत करें. हम साझी संस्‍कृति वाले रहे हैं, पड़ोसी देशों को भी समझना होगा कि भारत के मजबूत रहने में ही उनकी भी भलाई है. इस क्षेत्र में शांति और आर्थिक समृद्धि के जितने अधिक प्रयास होंगे उतना ही लोगों का भला हो सकेगा.
जहां तक भारत का सवाल है, हमने हमेशा प्रयास किया है कि पड़ोसी देशों से हमारे संबंध अच्‍छे रहें. लेकिन इसे हमारी कमजोरी भी नहीं समझा जाना चाहिए. आज का भारत बदला हुआ भारत है, हमारे प्रधानमंत्री ने हाल के अपने भाषण में साफ-साफ कहा भी है कि जिसको जैसी भाषा समझ में आती है, हम उसको वैसी ही भाषा में जवाब देने के लिए तैयार हैं. इतनी मजबूती से अपनी बात रखने वाला ऐसा भारत पहले नहीं था.

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