[button color=”” size=”” type=”round” target=”” link=””]––– संजीव कुमार[/button]

सुहागिन महिलाओं के लिए हरतालिका तीज व्रत एक प्रमुख व्रत है। ऐसी मान्यता है कि तीज व्रत करनेवाली महिलाओं का सुहाग अखंड रहता है। उमा और महादेव जैसी जोड़ी बनी रहती है। सुहागिन स्त्रियों को शिव-पार्वती अखंड सौभाग्य का वरदान देते हैं। पौराणिक मान्यता के अनुसार इस व्रत को सबसे पहले माता पार्वती ने भगवान शिव को वर रूप में पाने के लिए किया था।
यह पावन पर्व भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाया जाता है। इस वर्ष यह पर्व 21 अगस्त को मनाया जाएग । भाद्रपद की शुक्ल तृतीया को हस्त नक्षत्र में भगवान शिव और माता पार्वती के पूजन का विशेष महत्व है। इस दिन महिलाएं अपने पति की दीर्घायु के लिए निर्जला व्रत रखती हैं।
हरतालिका दो शब्दों से मिलकर बना है- हरत और आलिका। हरत का मतलब है ‘अपहरण’ और आलिका यानी ‘सहेली’। प्राचीन मान्यता के अनुसार मां पार्वती की सहेली उन्हें घने जंगल में ले जाकर छिपा देती हैं ताकि पर्वतराज अपनी पुत्री का विवाह विष्णु भगवान से न कर सकें। वहां पार्वती घोर साधना करती हैं। भाद्रपद की शुक्ल तृतीया को भगवान भोलेनाथ द्वारा उन्हें मनवांछित वरदान मिलता है।

हरतालिका व्रत की कहानी


पौराणिक मान्‍यताओं में बताया गया है कि सबसे पहले हरतालिका तीज व्रत माता पार्वती ने भगवान शिव जैसा वर पाने के लिए रखा था। कथा इस प्रकार है कि पिता के यज्ञ में अपने पति शिव का अपमान देवी सती सह न सकीं। उन्‍होंने खुद को यज्ञ की अग्नि में भस्‍म कर दिया। अगले जन्‍म में उन्‍होंने राजा हिमाचल के यहां जन्‍म लिया और पूर्व जन्‍म की स्‍मृति शेष रहने के कारण इस जन्‍म में भी उन्‍होंने भगवान शंकर को ही पति के रूप में प्राप्‍त करने के लिए तपस्‍या की। देवी पार्वती ने तो मन ही मन भगवान शिव को अपना पति मान लिया था और वह सदैव भगवान शिव की तपस्‍या में लीन रहतीं। पुत्री की यह हालत देखकर राजा हिमाचल को चिंता होने लगी। इस संबंध में उन्‍होंने नारदजी से चर्चा की तो उनके कहने पर उन्‍होंने अपनी पुत्री उमा का विवाह भगवान विष्‍णु से कराने का निश्‍चय किया। पार्वतीजी विष्‍णुजी से विवाह नहीं करना चाहती थीं। पार्वतीजी के मन की बात जानकर उनकी सखियां उन्‍हें लेकर घने जंगल में चली गईं। इस तरह सखियों द्वारा उनका हरण कर लेने की वजह से इस व्रत का नाम हरतालिका व्रत पड़ा। पार्वतीजी तब तक शिवजी की तपस्‍या करती रहीं जब तक उन्‍हें भगवान शिव पति के रूप में प्राप्‍त नहीं हुए। भाद्रपद के शुक्ल पक्ष तृतीया को भगवान भोलेनाथ ने प्रसन्न होकर पार्वती को वरदान दिया था। इस कारण से यह पर्व भाद्रपद शुक्ल तृतीया को मनाया जाता है।

सुहागिन औरतें हरतालिका तीज़ का व्रत करती हैं। हरतालिका तीज व्रत निराहार और निर्जला किया जाता है।


हरतालिका तीज के दिन भी गौरी-शंकर की पूजा की जाती है। हरतालिका तीज का व्रत बेहद कठिन है। इस दिन महिलाएं 24 घंटे से भी अधिक समय तक निर्जला व्रत करती हैं। यही नहीं रात के समय महिलाएं जागरण करती हैं और अगले दिन सुबह विधिवत पूजा-पाठ करने के बाद ही व्रत समापन होता हैं। मान्यता है कि हरतालिका तीज का व्रत करने से सुहागिन महिला के पति की उम्र लंबी होती है जबकि कुंवारी लड़कियों को मनचाहा वर मिलता है। यह पर्व भारत और नेपाल के लगभग सभी हिस्सों में मनाया जाता है।

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