आज जिनकी पुण्यतिथि है

वीरों की धरती भारत ने ऐसे असंख्य वीरों को जना है, जिसने समय-समय पर अपना सबकुछ त्याग कर इस देश की रक्षा के लिए अपना प्राण न्यौछावर किया है। भारत मां के ऐसे सपूतों में से ही एक हैं-अब्दुल हमीद। अब्दुल हमीद का जन्म उत्तर-प्रदेश के गाजीपुर जिले के धरमपुर गांव में 1 जुलाई, 1933 को एक साधारण मुस्लिम परिवार में हुआ था। अब्दुल हमीद के अंदर बचपन से देशभक्ति की भावना थी। उनके पिता उस्मान आजीविका चलाने के लिए कपड़े सिलाई का काम करते थे। उनके पिता की इच्छा थी कि हमीद भी सिलाई का काम सीखे लेकिन अब्दुल हमीद का मन सिलाई में बिल्कुल नहीं लगता था। उनकी रूचि अपने नाना और दादा के भांति कुश्ती के दांव-पेंच में ज्यादा लगती थी। वह बचपन से ही सेना में भर्ती हो अपने देश के लिए लड़ने का सपना देखते थे। इस कारण उन्होंने गुलेल से निशानेबाजी, नदी में तैरने का अभ्यास किया करते थे। उनका निशाना अचूक था साथ ही वह एक अच्छे तैराक भी थे।

संकट के समय दूसरों की मदद करना

संकट के समय दूसरों की मदद करना उन्हें हमेशा अच्छा लगता था। एक बार उनके गांव में 50 गुंडे ने जबरन एक किसान का फसल काटने की कोशिश की। जब हमीद को इसका पता लगा तो उन्होंने अकेले ही गुंडों का सामना कर उसे भागने पर मजबूर कर दिया। इसी तरह गांव में आई भीषण बाढ़ में बहती दो लड़की की जान उन्होंने बचाई थी। 21 वर्ष की उम्र में जीविकोपार्जन के लिए वे रेलवे में भर्ती हुए। वहां उनका मन नहीं लगा और वह भारतीय थल सेना में भर्ती हो गए।

अदम्य साहस का परिचय

भारत-चीन युद्ध (1962) में उन्होंने अपने साहस का परिचय दिया। युद्ध में भारतीय सेना का एक जत्था चीनी सैनिको के घेरे में आ गया जिसमें हमीद भी थे। वह लगातार मौत को चकमा दे मुकाबले के लिए मोर्चे पर डटे रहे। उनके साथी एक एक कर के कम होते जा रहे थे। लेकिन इसके विपरीत वीर हमीद की मशीनगन दुश्मनों पर मौत के गोले उगल रही थी। लेकिन कुछ ही देर में उनकी गोलियां खत्म हो गई। गोलियां खत्म होते देख उन्होंने अपनी वीरता के साथ समझदारी दिखाते हुए अपनी मशीन गन वहीं तोड़ दी और बर्फ से घिरी पहाड़ियों से रेंगते हुए वहा  से निकल पड़े। इस युद्ध के बाद उन्हें पदोन्नति देकर नायक हवलदार बना दिया गया।

भारत-पाकिस्तान युद्ध (1965) युद्ध में उन्होंने पाकिस्तान के अमेरिका द्वारा लिए गए 8 लोहा रूपी दैत्य पैंटन टैंक में से 7 को एक साधारण से गन माउंटेन जीप से अपनी अचूक निशानेबाजी के सहारे ध्वस्त कर दिया। उनका निशाना और समझदारी देख दुश्मन सेना भी हैरान थी। जिन टैंको पर पकिस्तान को बहुत नाज था। वह साधारण सी गन से  ध्वस्त हो रहे थे। वीर हमीद को देख भारतीय सैनिको में और जोश आ गया। वे सब पाकिस्तानी सेना को खदेड़ने में लग गए। एक एक कर सात पाकिस्तानी पैटन टैंक असल उताड़ गाँव (युद्ध स्थल) में टैंको की कब्रगाह में बदलता चला गया। पाकिस्तानी सैनिक अपनी जान बचा कर भागने लगे लेकिन वीर हमीद मौत बन कर उनके पीछे लग लगे थे तभी अचानक एक गोला हमीद के जीप पर आ गिरा जिससे वह बुरी तरह ज़ख़्मी हो गए। 10 सितम्बर को भारत का यह लाल हम सब को छोड़ वीरगति को प्राप्त हो गया।

सम्मानित किये गये परमवीर चक्र से

इस युद्ध में वीरतापूर्वक अदभुत पराक्रम का परिचय देने वाले वीर हमीद को पहले महावीर चक्र और फिर सेना का सर्वोच्च सम्मान परमवीर चक्र से अलंकृत किया गया। उसके बाद भारतीय डाक विभाग ने 28 जनवरी, 2000 को वीर अब्दुल हमीद के सम्मान में पांच डाक टिकटों के सेट में 3 रुपये का एक सचित्र डाक टिकट जारी किया।

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