जेपी सेनानी और प्रख्यात पत्रकार देवेंद्र मिश्र चिंताग्रस्त थे। 27 जुलाई को प्रखर समाज सेवक, रा.स्व. संघ के पूर्व प्रचारक और बिहार जेपी लोकतंत्र सेनानी संगठन के प्रदेश महासचिव उपेंद्र जी ने अंतिम सांस ली। 60 वर्षीय उपेंद्र जी के अंतिम समय में फेफड़े और लिवर में संक्रमण हो गया था।देवेंद्र जी के साथ आपातकाल में उपेंद्र कुमार जायसवाल ने महीनों समय जेल में बिताये थे।
उन दिनों की याद कर देवेंद्र मिश्र बताते हैं कि आपातकाल को लेकर युवाओं में बड़ा आक्रोश था। हर जगह युवा जत्था बनाकर गिरफ्तारी देते थे। इसी क्रम में उन्होंने भी गिरफ्तारी दी। जेल में उनकी मुलाकात उपेंद्र जायसवाल से भी हुई थी। 16 वर्षीय उपेंद्र ने मैट्रिक की परीक्षा कुछ समय पूर्व दी थी। सीतामढ़ी के बैरगनिया निवासी उपेंद्र जी मैट्रिक की परीक्षा देकर संघ कार्य में प्राण-पण से जुट गए थे। विस्तारक के तौर पर 2 वर्ष छपरा, सिवान और गोपालगंज में बिताया। उसी समय देश पर संकट आया। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अपनी सत्ता बचाने के लिए देश में आपातकाल लाद दिया। संघ पर प्रतिबंध लगा दिया गया। सभी जगहों से प्रतिकार हुआ। संघ के स्वयंसेवकों ने भी इस संघर्ष में बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया। उपेन्द्रजी ऐसे मौकों में सदा आगे रहते। आपातकालीन संघर्ष में शामिल हुए। जेल गए। आपातकाल की समाप्ति के बाद वापस घर आये। 7 मई, 1979 को गृहस्थाश्रम में आये। पिताजी के कहने पर पटना में व्यवसाय शुरू किया। व्यवसाय बढिया चलने लगा। दुर्भाग्य से बिहार में एक ऐसे व्यक्ति की सरकार आई, जो आपातकालीन संघर्ष के दौरान उभरे थे । कथनी और करनी में काफी अंतर था। जेपी और लोहिया के नाम पर सत्ता में आये ऐसे समाजवादियों की सरकार में अपराध चरम पर आ गया। बिहार के व्यवसायी अपहरण के शिकार हो रहे थे। बिहार के अच्छे व्यवसायियों में शुमार उपेंद्र जी को भी पैसे के लिए 1997 में अगवा कर लिया गया। किसी प्रकार अपहर्ताओं ने छोड़ा। पटना के व्यवसाय को समेट वापस बैरगनिया आ गए। हालात सामान्य होने पर वापस 2007 में पटना आये। अपने व्यवसाय को नए ढंग शुरू किया। व्यवसाय, पारिवारिक दायित्व और सामाजिक कार्यों में गजब का संतुलन था।
समय अपनी गति से चल रहा था। जेपी सेनानियों ने संगठन बनाया ताकि बढ़ते उम्र में एक दूसरे का साथ मिल सके। उपेंद्र जी ने भी संगठन को आगे बढ़ाया। जेपी सेनानी संगठन के कोषाध्यक्ष बनें। संगठन को चलाने के लिए संसाधन की भी आवश्यकता होती है। उपेंद्र जी की आदत थी, किसी भी सार्वजनिक कार्य में अग्रणी रहते। कहते पैसे का सबसे बड़ा उपयोग दान ही होता है। अच्छे उद्देश्य और अच्छे कार्यशैली वाले संगठन को कभी संसाधन के अभाव में मुरझाते नहीं देख सकते। अक्सर भामाशाह की कहानी सुनाते। बातचीत में कहते आपलोग संगठन की चिंता कीजिये बाकि मेरे ऊपर छोड़ दीजिए। जेपी सेनानियों से भी एक माह की पेंशन प्रधानमंत्री कोष में देने की पेशकश की थी।
उम्र के साथ शारीरिक परेशानी भी बढ़ने लगी थी। मधुमेह से पीड़ित थे। इस लॉकडाउन में अचानक तबियत बिगड़ी। आनन फानन में अस्पताल में भर्ती किया गया। न सिर्फ मधुमेह का स्तर काफी बढ़ गया था बल्कि लीवर की समस्या भी विकट हो गई थी। फेफड़े का भी संक्रमण सामने आया।चिकित्सकों का प्रयास रंग नहीं ला सका। अन्ततः 27 जुलाई को पटना के मेडिसिटी अस्पताल में अपने नश्वर शरीर का त्याग कर दिया। मुखाग्नि बड़े पुत्र रवि चंद्रा ने दी। बड़े पुत्र पिता के व्यवसाय को संभालते है। छोटे पुत्र रोहित चंद्रा सामाजिक कार्यों में सतत सक्रिय रहते हैं।

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