वास्तविक परिवर्तन का आरंभ हमेशा स्वयं से – मुकुल कानिटकर

मंच पर बैठे प्रमुख वक्ता श्री मुकुल जी कानेटकर जी एवं अन्य अधिकारी

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में आयोजित विशेष गतिविधियों की श्रृंखला के अंतर्गत बिहार श्री नगर में प्रमुख जन संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य विभिन्न समाजों के प्रमुख व्यक्तियों, सामाजिक नेतृत्व तथा समुदाय प्रतिनिधियों को एक ही मंच पर आमंत्रित कर समाज के समसामयिक मुद्दों पर विचार-विमर्श, सामूहिक मत निर्माण, तथा समाजहित में सकारात्मक पहल की दिशा निर्धारित करना था। कार्यक्रम का केंद्रीय विषय “पंच परिवर्तन” रहा, जिसके माध्यम से समाज में व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक और राष्ट्रीय स्तर पर होने वाले सतत परिवर्तन की अवधारणा को विस्तारपूर्वक समझाया गया।

संगोष्ठी के लिए समाज की ४० श्रेणी को चिंहित कर आमंत्रित किया गया। ३५ श्रेणी के विविध समाजों एवं समुदायों के ३०० से ज्यादा प्रतिष्ठित सामाजिक कार्यकर्ता जैसे कलाकार, व्यवसाई, सामाजिक कार्यकर्ता, इंफ्लूएंसर, प्रोफेसर, कीर्तनकार, योग शिक्षक, ढोल ताशा पथक, सीए, डॉक्टर, वकिल, मोटिवेशनल स्पीकर, एन जि ओ चलाने वाले, बजत गट, स्वाध्याय परिवार, गायत्री परिवार, रामकृष्ण मिशन, कोचिंग क्लास, स्कूल, मंदिर एवं समाज भवन के अध्यक्ष ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की। कार्यक्रम में नालंदा जिला के संघचालक श्री बृज बिहारी जी एवं विभाग सह संघचालक अशोक कुमार जी,कार्यक्रम के संयोजक डॉ० विजय कर्ण एवं कार्यक्रम के अध्यक्ष नरेश सिंह चौधरी उप कमांडेंट (सीआरपीएफ) आरटीसी राजगीर उपस्थित रहकर मार्गदर्शन एवं समन्वय का कार्य करते रहे।

कार्यक्रम के प्रमुख वक्ता श्री मुकुल जी कानेटकर ने अपने प्रभावी उद्बोधन से संगोष्ठी का मार्गदर्शन किया तथा पंच परिवर्तन की संकल्पना को सरल, सारगर्भित और प्रेरक रूप में प्रस्तुत किया। उनके वक्तव्य ने उपस्थित जनों को समाज निर्माण के व्यापक दृष्टिकोण से जोड़ते हुए रचनात्मक योगदान के लिए प्रेरित किया।

मुकुल जी ने अपने उद्बोधन की शुरुआत भारत की परिभाषा से करते हुए कहा कि भारत और राष्ट्रीयता हमारे लिए न तो कोई आर्थिक विषय है और न ही राजनीतिक; यह किसी एक भाषा से निर्मित राष्ट्र भी नहीं है। इस राष्ट्र का वास्तविक आधार हमारी संस्कृति, हमारे संस्कार और हमारे भीतर की आत्मीयता है। यही भाव तब प्रकट होता है जब भुज में भूकंप आता है और पूरा देश सहायता के लिए खड़ा हो जाता है, या केदारनाथ में मन्दाकिनी फटती है तो देश के कोने-कोने से लोग पहुँचकर सेवा करते हैं। यही भाव वह है जो चंद्रयान के चंद्रमा के दक्षिण ध्रुव पर पहुँचने पर पूरे देश को एक साथ उल्लास से भर देता है, और यही भावना क्रिकेट टीम के विश्व कप जीतने पर हर भारतीय के मन में झलकती है।

भारत की यह एकात्म चेतना नई नहीं है। इसे हम इतिहास में भी देखते हैं—शंकर देव हों या गुरु नानक देव, दोनों ने भारत के एक छोर से दूसरे छोर तक भ्रमण किया। उन्हें भाषाई बाधाओं ने

कभी नहीं रोका। शंकराचार्य जब केरल से निकलकर देश के चारों दिशाओं में चार पीठों की स्थापना करते हैं, तब भी भाषा उनके मार्ग में अवरोध नहीं बनती। यही इस राष्ट्र की मूल भावना है—एक संस्कृति, एक आत्मा और एक साझा अनुभूति।

उद्बोधन में आगे उन्होंने “पंच परिवर्तन” की संकल्पना को विस्तार से समझाया। उनका कहना था कि वास्तविक परिवर्तन का आरंभ हमेशा स्वयं से होता है। स्वयं में आए परिवर्तन से परिवार में परिवर्तन आता है, परिवार का परिवर्तन समाज में और समाज का परिवर्तन राष्ट्र में प्रवाहित होता है। राष्ट्र के स्तर पर यह परिवर्तन संपूर्ण सृष्टि को प्रभावित करता है और अंततः यह परिवर्तन परमेष्ठी तक पहुँचता है।

‘कुटुंब प्रबोधन’ की व्याख्या करते हुए उन्होंने बताया कि संयुक्त परिवार होना किसी टूटन का संकेत नहीं, बल्कि परिवार के विस्तार का प्रतीक है। कोरोना महामारी में इसका अद्भुत उदाहरण देखने को मिला जब परिवार के लोग विश्व के अलग-अलग हिस्सों में रहते हुए भी वीडियो कॉल पर एक साथ बैठकर रामरक्षा स्तोत्र का पाठ कर रहे थे। भारतीय समाज ने तकनीक का उपयोग परिवार को जोड़ने के लिए किया है, न कि तोड़ने के लिए। यही कारण है कि अधिकांश परिवारों में पहला व्हाट्सऐप ग्रुप परिवार का ही होता है—ददिहाल, ननिहाल, मायका, ससुराल—हर स्तर पर संबंधों को जोड़ने का प्रयास दिखता है। उन्होंने यह भी कहा कि परिवार को एक बनाए रखने का सबसे बड़ा सूत्र संवाद है। संवाद के अभाव में दूरियाँ बढ़ती हैं और कई सामाजिक समस्याएँ जन्म लेती हैं। संस्कार उपदेश से नहीं, बल्कि आचरण से आते हैं; इसलिए परिवार के वातावरण में संवाद और आदर्श आचरण दोनों आवश्यक हैं।

सामाजिक समरसता पर बोलते हुए उन्होंने अस्पृश्यता के पूर्ण निषेध पर बल दिया। आरक्षण को उन्होंने एक सकारात्मक व्यवस्था बताया—जैसे घर में यदि चार बच्चों में से एक दुर्बल हो जाए, तो माँ उसके गिलास में थोड़ा अधिक दूध डालती है ताकि वह जल्दी सशक्त हो सके। आरक्षण का उद्देश्य भी यही है—समाज के कमजोर वर्गों को सशक्त बनाना। उन्होंने नागपुर के प्रसिद्ध ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. कांबले का उदाहरण दिया, जिनका प्रवेश भले आरक्षण के माध्यम से हुआ हो, परंतु वे राष्ट्र के श्रेष्ठ चिकित्सक अपनी निरंतर मेहनत और प्रतिभा से बने हैं। उन्होंने कहा कि सम्मान ही समरसता का आधार है और पूरे हिंदू समाज ने “न हिन्दू पतितो भवेत” का संकल्प इसी भावना से लिया है।

नागरिक कर्त्तव्यों पर उन्होंने स्पष्ट कहा कि राष्ट्र निर्माण की शुरुआत छोटी-छोटी बातों से होती है—जैसे सिग्नल न तोड़ना, हेलमेट नियमों के कारण पहनना न कि पुलिस को देखकर। जैसे हमें संविधान से मौलिक अधिकार मिले हैं, वैसे ही भारत माता का भी यह अधिकार है कि हम अपने कर्तव्यों का पालन करें। जो व्यक्ति टैक्स चोरी करता है, कचरा फैलाता है, नियमों का पालन नहीं करता, वह भारत को माता कहने के योग्य नहीं बन पाता।

पर्यावरण संरक्षण के संदर्भ में उन्होंने तीन सरल सूत्र दिए—पेड़ लगाना, पानी बचाना और प्लास्टिक हटाना। इन “तीन प” की संवेदना यदि हर व्यक्ति अपने जीवन में उतार ले, तो पर्यावरण संरक्षण सहज ही संस्कार बन सकता है।

स्वदेशी की अवधारणा पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि “स्व का बोध” जीवन के हर क्षेत्र में—परिवार, पड़ोस, कार्यस्थल और व्यक्तिगत आचरण—सबमें आना चाहिए। उन्होंने बताया कि यदि हम अपनी भाषा, भूषा, भजन, भवन, भोजन और भ्रमण इन छह आयामों में स्वदेशी भाव को आचरण में उतार सकें, तो भारत माता अवश्य विश्व गुरु बनेगी। उन्होंने यह भी कहा कि माता को “मम्मी” जैसे शब्दों से न पुकारें, जिनमें आत्मीयता नहीं है; हमारी भाषाओं में “आई, माँ, अम्मा, बाई” जैसे अनगिनत सुंदर और भावपूर्ण संबोधन उपलब्ध हैं। भाषा पर अभिमान अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने बताया कि दुनिया के सबसे गरीब देश विदेशी भाषा में पढ़ाते हैं और सबसे अमीर देश अपनी मातृभाषा में। COEP पुणे की पहली इंजीनियरिंग बैच पूर्णतः मराठी माध्यम से पढ़कर निकली और संपूर्ण बैच सफलतापूर्वक प्लेस भी हुई—यह इस बात का प्रमाण है कि हमारी भाषाएँ सक्षम, समृद्ध और भविष्य के निर्माण में पूर्णत: समर्थ हैं।

संगोष्ठी के अंत में लगभग चालीस मिनट का एक विस्तृत चर्चा सत्र आयोजित किया गया, जिसमें उपस्थित सभी सामाजिक प्रमुखों ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की। इस सत्र में उन्होंने अपने प्रश्न प्रस्तुत किए, अपने अनुभव साझा किए तथा समाज से जुड़े विविध विषयों पर एक गंभीर, सारगर्भित और वैचारिक विमर्श हुआ। विचारों के आदान-प्रदान ने कार्यक्रम को और अधिक अर्थपूर्ण एवं प्रभावशाली बनाया।

 

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