पटना (विसंके)। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान कई ऐसे स्वतंत्रता सेनानी हुए हैं जो युवा अवस्था में प्रवेश करने के साथ-साथ भारत को स्वतंत्र कराने के लिए अपना सब कुछ भारत भूमि को समर्पित कर गए। संघ में एक संकल्प स्वंतंत्रता संग्राम के दौरान सभी स्वयंसेवकों को लेना होता है जो इस प्रकार है-

मैं अपने राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिए तन-मन और धनपूर्वक आजन्म और प्रमाणिकता से प्रयत्नरत रहने का संकल्प लेता हूँ।’

khudi ram boss 01संघ के स्थापना से 17 साल पहले ही एक युवा क्रन्तिकारी देशभक्त ने इस संकल्प को अपने जीवन में चरितार्थ कर लिया था। 18 साल की उम्र में एक युवा देश के लिए फांसी के फंदे पर चढ़ गए थे। उनका नाम खुदीराम बोस है। आज उनकी पुण्यतिथि है। आज ही के दिन 1908 में उन्हें फांसी की सजा हुई थी। अपनी शहादत के बाद खुदीराम इतने लोकप्रिय हुए कि बंगाल में उनके नाम की धोती बुनी जाने लगीं और युवा उस धोती को पहना करते थे। फांसी से पहले खुदीराम बोस की एक तस्वीर सामने आई थी जिसमें उनके पैरों में रस्सी तो थी लेकिन चेहरा आत्मविश्वास और देश के लिए शहीद होने के गर्व से भरा हुआ था। उस तस्वीर में करोड़ों भारतीयों के साथ-साथ उन अंग्रेज शासकों के लिए भी संदेश छिपा था कि हम भारतीय सजा-ए-मौत से घबराते नहीं हैं, हमें इससे डराने की रत्तीभर भी कोशिश मत करना।

1908 में खुदीराम बोस के जीवन में निर्णायक पल आया जब उन्हें और दूसरे क्रांतिकारी प्रफुल चाकी को मुजफ्फरपुर के जिला मैजिस्ट्रैट किंग्सफोर्ड की हत्या का काम सौंपा गया। किंग्सफोर्ड की हत्या के पहले कई प्रयास हुए थे लेकिन सब फेल रहे।

किंग्सफोर्ड पर खुदीराम बोस द्वारा किये गए हमले में किंग्सफोर्ड की पत्नी एवं बेटी मारी गई। प्रफुल चाकी ने खुद को गोली मार ली। और इसी तरह खुदीराम बोस भी पकड़े गए और उन पर हत्या का मुकदमा चला। उन्होंने अपने बयान में स्वीकार किया कि उन्होंने तो किंग्सफोर्ड को मारने का प्रयास किया था लेकिन, इस बात पर बहुत अफसोस है कि निर्दोष मिसेज कैनेडी और उनकी बेटी गलती से मारे गए। यह मुकदमा केवल पांच दिन चला। 8 जून, 1908 को उन्हें अदालत में पेश किया गया और 13 जून को उन्हें मौत की सजा सुनाई गई। 11 अगस्त, 1908 को उन्हें फांसी पर चढ़ा दिया गया।

लेख – गौरव रंजन (शोध प्रज्ञ )

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